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“तुं ही तो मेरा वजुद है बेटी”

Posted On: 28 Mar, 2010 में

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मैं चुराकर लाई हुं तेरी वो तस्वीर जो हमारे साथ तूने खींचवाई थी मेरे जाने पर।

में चुराकर लाई हुं तेरे हा थों के वो रुमाल जिससे तूं अपना चहेरा पोंछा करती थी।

मैं चुराकर लाई हुं वो तेरे कपडे जो तुं पहना करती थी।

मैं चुराकर लाई हुं पानी का वो प्याला, जो तु हम सब से अलग छूपाए रख़ती थी।

मैं चुराकर लाई हुं वो बिस्तर, जिस पर तूं सोया करती थी।

मैं चुराकर लाई हुं कुछ रुपये जिस पर तेरे पान ख़ाई उँगलीयों के नशाँ हैं।

मैं चुराकर लाई हुं तेरे सुफ़ेद बाल, जिससे मैं तेरी चोटी बनाया करती थी।

जी चाहता है उन सब चीज़ों को चुरा लाउं जिस जिस को तेरी उँगलीयों ने छुआ है।

हर दिवार, तेरे बोये हुए पौधे,तेरी तसबीह , तेरे सज़दे,तेरे ख़्वाब,तेरी दवाई, तेरी रज़ाई

यहां तक की तेरी कलाई से उतारी गई वो, सुहागन चुडीयाँ, चुरा लाई हुं माँ

घर आकर आईने के सामने अपने को तेरे कपडों में देख़ा तो,

मानों आईने के उस पार से तूं बोली, बेटी कितनी यादोँ को समेटती रहोगी?

मैं तुज़ में तो समाई हुई हुं।

तुं ही तो मेरा वजुद है बेटी

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ASHISH RAJVANSHI के द्वारा
March 31, 2010

अतुलनीय श्रद्धांजली | खुदा के नेक बन्दों में से एक हैं आप और सदा बनी रहें , यही कामना है | एक बेटी होने का धर्मं-कर्म आपने बखूबी निभाया है | धन्यवाद |

mahesh के द्वारा
March 29, 2010

सीधे साधे शब्दों में आपने जिस तरह अपनी बेटी के प्रति अपने प्यार का विवरण किया है वह बहुत ही शानदार हैं.

    ASHISH RAJVANSHI के द्वारा
    March 31, 2010

    महेश जी ये लगाव बेटी के प्रति न होकर अपनी माँ के प्रति है |


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