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एक "माँ" की कहानी..........

Posted On: 23 Apr, 2010 Others में

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हाँ !  में “माँ” हुं।

कभी मैं भी जवान थी।

पर आज 63 कि उम्र में अब 100 से भी ज़्यादा लग रही हुं।

कारन?

……. मेरे  कुछ बेवफ़ा/ गद्दार “संतानोंकि वजह से।

जिन्हों ने मुझे कमज़ोर कर दिया है।

आज में आपको अपनी तस्वीर बतानेवाली हुं एक आत्मकथा के रुप में।

पर अब सिर्फ़ कहलाने को रह गई हुं। मेरी ही संतान मुझे खोखला करने पर तुली हुई है।

दुनिया के सामने तो मेरा नाम बडे ही गर्व से लेती है मेरी संतान के कि ये हमारी “माँ “है।

पर अंदर ही अंदर मेरे बच्चे आपस में लदते-झगडते रहते हैं।

वो भी क्या ज़माना था कि मेरे लिये जान देने को मेरी संतान तैयार थी।  पर आज …… ये संतान मेरी जान के पीछे पडी हुई है।

अपने स्वार्थ की ख़ातिर इन लोगों ने मुझे बदनाम कर रख्खा है।

कभी पैसों कि खातिर तो कभी ज़मीन की ख़ातिर।

कहती रहती हुं कि भाई !!

अरे आपस में मिलकर रहो ।

“अगर तुम सब यूं ही लडते-झगडते रहोगे तो पडोसी तो खुश होंगे ही”।

कहेंगे “अपने आप पर ये “माँ” को बडा गुरुर था । जाने दो ये सब बाहरी दिखावा है भीतर क्या है खुलकर सामने आता है”।

बताओ तब मेरा ख़ून खौलेगा या नहिं???????

क्यों मेरी आत्मा के साथ आई पी एल ख़ेले जा रहेहो   भ्रष्टाचार के रुप में।

क्या इसलिये कि मैं………..भारतमाता.…….हुं?

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ASHISH RAJVANSHI के द्वारा
April 23, 2010

रजिया जी , सलाम-आले-कुम अलंकार का बेहद सटीक उपयोग किया है आपने अपनी इस रचना में | बात गहरी है और साथ ही अप्रत्यक्ष ‘सच’ भी | ऐसी रचनाओ के लिए बहुत बहुत शुक्रिया | आगे भी आपसे ऐसी ही अपेक्षा रहेगी | धन्यवाद |


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