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फ़तवा...फ़तवा..फ़तवा

Posted On: 12 May, 2010 में

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fअब बस। बहोत हो चूका ।

किसी बात की हद होती है। हद से आगे तो फ़िर हद हो जाती है।

नाम बदनाम कर दिया है आप लोगों ने इस्लाम का।

फ़तवा..फ़तवा..फ़तवा

आप  लोगों पर ही फ़तवा जारी कर देना चाहिये।

अभी तक सब चूप्पी मारे बैठे रहे अभी तो आप लोग सर चढकर फ़तवे निकाल रहे हो उलजलुल किसम के।

क्यों फ़तवे के नाम को बदनाम करने पर तुले हो?

फ़तवा इस्लाम में एक धार्मिक किसी मान्यता प्राप्त प्राधिकारी द्वारा जारी निर्देश के लिए इस्तेमाल किया जाता है.    फतवा जारी करने का  ज्ञान अनुभव  है आपमें?

क्यों अपने मज़हब के साथ साथ अपने देश को भी 1800 की सदी की तरफ़ ढकेल रहे हो?

औरतों का मर्द लोगों के साथ काम करना हराम है ये भला कैसी बात हुई?

हम से तो वो मुस्लिम बहुमती वाले देश आगे हैं जहाँ की जनता बेनज़ीर भुट्टॉ को प्रधानमंत्री कि सीट पर बैठाती है या  बांग्लादेश में शेख हसीना जैसी महिलाओं को देश के सर्वोच्च स्थान

पर ले आते हैं। आप बताइये आप वहां के लोगों पर फतवा जारी क्यों नहिं करते?

सिर्फ भारत की महिलाओं पर ही आपके ये तालिबानी फ़तवे क्यों?

इल्म की रोशनी से ही घर व समाज को रोशन किया जा सकता है। तालीम व सच्चाई से ही कामयाबी हासिल की जा सकती है।

आज बेटीओं को इल्म की सबसे ज्यादा अहमियत है।

अब तो हँसी आती है और तरस भी आता है आप लोगों पर क्योंकि आपकी कोई सुनता ही नहिं है।

और क्यों सुने? क्या आप आकर इन सब के घरों में अनाज डाल जाते हो सालभर का या फिर आप आकर बच्चों  कि फ़ीस भर जाते हो? या फ़िर आप लोग किसी मरीज की

दवाई काख़र्च उठाते हो?

क्यों सुने आपके कोई फ़तवो6 को जो फ़तवे के नाम को बदनाम करते हैं।

अगत फतवा देना ही है तो पहले अपने आप से ही शुरुआत करो। अपने घरों में झांककर देखो कि कहीं तुम ” फ़तवों” के पैसों से तो नहिं जी रहे हो? बेटीयों पर ही फतवे क्यों?

हराम क्या हलाल क्या ख़ुद अपने में झांककर देखो।

मुझे अच्छी तरहां याद है कि सरकारी काम से मुझे ” मक्का शरीफ’ जाने का मौका मिला। मैं दिल्ही में जामा मस्जीद के पास लगे शामियाने में अपने शौहर  और भाई के साथ

:अहेराम;( उमराह-हज के दौरान सर पर बाधने का लेने दुकान पर गइ। दो तीन दुकानो6 पर जवान लडके बैठे थे और एक दुकान दार चाचा ज़ईफ थे। मैने सोचा कि चलो

बेचारे बूठे बाबा के पास से ही कुछ खरीदारी करलुं।

मैने अपने हिसाब से कपडा मांगा। बाबा कपदा कातते हुए मेरे शौहर को देखकर बोले” आप नहिं जा रहे हो मक्का?”

मेरे शौहर  बोले ये तो सर्विस पर जा रही है “। तभी दुकान वाले बाबा बोले अरे ये तो हराम है।

अभी बगल में ख़डा मेरा भाई बोला कि “चाचा आपने जो कपडा हमें दिया उसे ज़रा फ़िर से नाप लो क्योंकि आपने हमें छोटा टुकडा दिया है ये हराम नहिं क्या?

ये बात ईसलिये लिख रही हुं कि वो अपने मतलब से हराम-हलाल तय करते हैं । अगर मेरे शौहर ने कुछ ख़रीद लिया होता तो हराम -हलाल का सवाल ही नहिं होता।

और ऐसी ही लोग फतवे जारी करते हैं जो उनकी समझ से परे हैं।

मैं भी एक नौकरी पेशा महिला हुं।  मेरी “माँ” ने अनपढ होते हुए हमें बहेतर तालिम दी है जो आज मै ऐसी जगह पर हुं।

वो भी बडी नमाज़ी रोजदार औरत थी। पर उसे पता था कि लडकी की पढाई क्या मायने रखती है।

अपनी इज़्जत को बरकरार रखकर अपने घरगृहस्थी को संभालकर अगर कोई महिला काम करती है तो आप लोगों को आपत्ती क्यों?

मै एक भारतीय मुस्लिम महिला होने के नाते ऐसे  फ़तवों का बहिष्कार करती हुं।

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37 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    anjaan के द्वारा
    May 21, 2010

    आप तो अपनी भडाश निकालने लगे, दुसरो की कमियां निकालने से आपकी अपनी कमियां दूर नहीं हो जाती है, लेकिन सवाल मानसिकता का है अगर कोई सुधार लाना ही नहीं चाहता और उसके एवज में पचास बहाने बनाये या दुसरो की कमियां निकाले तो आपका अल्लाह भी उसकी कोई मदद नहीं कर सकता,इस दुनिया में कोई भी ऐसा धर्म नहीं जिसमे मानवता के कल्याण की बाते न हो और कुछ ऐसी बाते न हो जिसे आज उचित नहीं ठहराया जा सकता,फैसला आपको लेना होता है खुले दिमाग से लेकिन अगर सुधार लाना चाहते है तो ! मै बिना किसी टिप्पड़ी के कुछ फतवों को यहाँ कॉपी कर रहा हूँ आपकी जानकारी के लिए,,,,, />“अब चूँकि इमराना के साथ उसके ससुर ने शारीरिक सम्बंध बना लिये है लिहाजा इमराना का पति अब इमराना के लिये बेटे समान है, इसलिये इमराना का पति, इमराना को तलाक दे! मुस्लिम महिलाओं का बेपर्दा होकर बात करना ग़ैर इस्लामी, मर्दा के साथ काम करना ग़ैर इस्लामी! देवबंद स्थित इस्लामिक शिक्षा संस्थान दारुल उलूम ने फतवा जारी कर कहा है कि मुसलमान योग गुरु बाबा रामदेव के कैंप में न जाएं क्योंकि उसकी शुरुआत में वंदेमातरम गाया जाता है! जेद्दाह : जेद्दाह में एक सऊदी अदालत ने पिछले साल सामूहिक बलात्कार की शिकार लड़की को 90 कोड़े मारने की सजा दी थी। उसके वकील ने इस सजा के खिलाफ अपील की तो अदालत ने सजा बढ़ा दी और हुक्म दिया: ‘200 कोड़े मारे जाएं।’ लड़की को 6 महीने कैद की सजा भी सुना दी। अदालत का कहना है कि उसने अपनी बात मीडिया तक पहुंचाकर न्याय की प्रक्रिया पर असर डालने की कोशिश की। कोर्ट ने अभियुक्तों की सजा भी दुगनी कर दी। इस फैसले से वकील भी हैरान हैं। बहस छिड़ गई है कि 21वीं सदी में सऊदी अरब में औरतों का दर्जा क्या है? उस पर जुल्म तो करता है मर्द, लेकिन सबसे ज्यादा सजा भी औरत को ही दी जाती है। बेटी से निकाह कर उसे गर्भवती किया जलपाईगुड़ी : पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में एक व्यक्ति ने सारी मर्यादाओं को तोड़ते हुए अपनी सगी बेटी से ही शादी कर ली और उसे गर्भवती भी कर दिया है। यही नहीं , वह इसे सही ठहराने के लिए कहा रहा है कि इस रिश्ते को खुदा की मंजूरी है। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि इस निकाह का गवाह कोई और नहीं खुद लड़की की मां और उस शख्स की बीवी थी। काहिरा : मिस्र में पिछले दिनों आए दो अजीबोगरीब फतवों ने अजीब सी स्थिति पैदा कर दी है। ये फतवे किसी ऐरे-गैरे की ओर से नहीं बल्कि देश के टॉप मौलवियों की ओर से जारी किए जा रहे हैं। देश के बड़े मुफ्तियों में से एक इज्ज़ात आतियाह ने कुछ ही दिन पहले नौकरीपेशा महिलाओं द्वारा अपने कुंआरे पुरुष को-वर्करों को कम से कम 5 बार अपनी छाती का दूध पिलाने का फतवा जारी किया। तर्क यह दिया गया कि इससे उनमें मां-बेटों की रिलेशनशिप बनेगी और अकेलेपन के दौरान वे किसी भी इस्लामिक मान्यता को तोड़ने से बचेंगे! नदवातुल उलेमा के प्राचार्य मौलाना सईदउर रहमान आज़मी नदवई,ने देवबंदके फतवे का समर्थन करते हुए कहा कि शरियत में इस सम्बन्ध में सख्त हिदायत है कि कामकाजी महिलाओं को दफ्तरों में काम करने वाले पुरुषों में घुल मिल नहीं जाना चाहिए|हालांकि जब मौलाना से पुछा गया कि इस फतवे के अमल में आने के बाद क्या लोक सभा में भी मुस्लिम महिलाएं अलग जगहों पर बैठेंगी, तो उन्होंने चुप्पी साध ली! बीमा पोलिसी पर फतवा जारी करते हुए देवबंद ने कहा कि बीमा योजनाओं से ब्याज जुटाना जुए के समान है जो कि इस्लामी रिवाजों के खिलाफ हैं। यह गैर कानूनी तरीके से पैसे कमाने के समान है! सलमान जी मुझे आपका जवाब नहीं चाहिए एक कुठित मानसिकता और पैमानों के दोहरे चश्मे कहाँ लगे है जरा सा सिर्फ इस पर विचार कर लीजियेगा

SALMAN के द्वारा
May 19, 2010

एक बार फिर मीडिया के कुछ लोगों ने अपने ज़हनी दिवालियापन का तमाशा लोगों को जम कर दिखाया। फतवे की आड़ में उन्होने भी अपनी ज़ुबान चलाई जिनकी नज़रे भी नहीं उठनी चाहिए थी। दारुलउलूम ने साफ कर दिया है कि उसकी तरफ से कोई फतवा जारी नहीं किया गया। लेकिन इस सब के बावजूद अगर मौजूदा माहौल और महिलाओं की बढती असुरक्षा और वर्कप्लैस पर होने वाले हरासमेंट को देखा जाए तो कोई भी माता पिता जब तक उसकी बेटी घर लौट कर नहीं आती बिना किसी भी फतवे के ही बेचैन रहता है। निरुपमा नाम की पत्रकार काम करने या अपने साथी से दोस्ती के दौरान प्रेगनेंट हो गई उसके मां बाप ने जो किया वो किसी फतवे का नतीजा नहीं था । इसके अलावा खुद महिला सघंटन वर्क प्लेस पर महिलाओं के शोषण और उनके साथ आए दिन होने वाले सलात्कार (जीं हां जब बात फैलती है तो उसको बलात्कार कहा जाता है और बात ना खुले तो सलात्कार ) के खिलाफ आवाजे उठाते रहे हैं। लेकिन उनकी आवाज़ सुनने की फुरसत किसे है। इसी मीडिया की कितनी एंकरों और महिला कर्मियों की कितनी अश्लील सीडी और एमएमएस बाजार में चल रही हैं ये सब जानते हैं..! मीडिया की कितनी ही महिला कर्मियों ने वर्कप्लेस पर होने वाले अपने शोषण से तंग आकर आत्म हत्या किस फतवे के तहत की ये कौन बताएगा..? इतना ही नहीं अगर लड़कियों के घर से बाहर काम करने या मर्दों के साथ काम करने जाने की बात हो तो हर शर्मदार और सुसंस्कृत माता पिता अपनी बेटी को यही हिदायत देगा कि बेटी मर्दों से ज्यादा घुलना मिलना मत, या ज़रा सोच समझ कर, या बेबाकी से परहेज करना। हालाकि माता पिता की इस नसीहत को भी फतवे की भाषा बनाया जा सकता है। ऐसे में कुछ कथित मुस्लिम बुद्दीजीवी भी अपने हाथ साफ करने से नहीं चूकते। जावेद अख्तर को सुरक्षा देने वाली पुलिस को चाहिए कि उनको धमकी देने वाले को भी तो सामने लाए। कि आखिर वो है कौन..? कहीं सनातन जैसी किसी संस्था का ही कोई सिरफिरा हुआ तो..? इसके अलावा जावेद अख्तर कब से इतने बड़े आलिम हो गये कि वो मज़हबी मामलो में भी दखल रखने लगे। आम मुसलमान हो या खास कोई भी अपनी बेटी या बेटे का निकाह अगर जावेद अख्तर से पढावा ले तो ज़रा बताएं …? फतवों को बदनाम करने वालों ने ये कभी नहीं दिखाया कि इस्लाम ही एक ऐसा मज़हब है जिसके पैगम्बर(स.) ने फरमाया कि इल्म हासिल करो चाहे चीन ही क्यों ना जाने पड़े। इस हदीस में बेहद ख़ास बात है। वो ये कि उस जमाने में ना तो चीन में इस्लाम पहुचा था और ना ही चीन साइंस और टेक्नोलोजी में एंडावास था। अगर इल्म यानि शिक्षा को सिर्फ इस्लामी शिक्षा से जोडा जाता तो चीन के बजाए अरब बुलाने की बात होती। इसके अलावा इस्लाम ने महिलाओं को बाज़ारू या ताड़न की अधिकारी ना बना कर इज्जत और उसके कदमों में जन्नत तक रख दी है। लेकिन एक कुठित मानसिकता और पैमानों के दोहरे चश्मे लगाने वालो को प्रज्ञा ठाकुर पर चर्चा करने या नक्सलियों को आंतकी कहने में झिझक ही रहती है। लेकिन चूंकि हर बार हर मामले में चाहे इमराना हो या आई जी पांडया। कुछ लोगों के दोहरे पैमाने बन चुके हैं। अगर आधूनिक राधा आईजी पंड्या का नाम कोई सा खान होता तो उस को भी नए शगूफे की तरह पेश किया जाता। मर्द होकर पंडा की नथनी और साड़ी को भी कोई ना कोई मंज़हबी रूप दिया जाता। इस्लाम सिर्फ एक मज़हब ही नहीं, बल्कि ज़िन्दगी को जीने का एक मुकम्मल तरीका है। कानून होता ही इंसानों के लिए है, हैवान किसी कानून को कब मानते हैं.. साथ ही आलिमो को भी चाहिए कि हर मामले पर बोलने से पहले इस बात का ख्याल रखें कि आपकी एक गलत बात बहुत दूर तक और बहुत देर तक असर लाएगी।

garima के द्वारा
May 18, 2010

Hi I am an Indian just like u and do agree with your views. People should start disobeying these nonsence ‘Fatvas’. There is public law in our country which is equaly applicable on each and every one. How honest and dutifull we are towards our family and our religion, we need not to take a certificate from any one in this world. Being a wife, a daughter, a sister and a mother if we are satisfying ourself then we have a right to live a life as we want. The most important part hare is that this courage can only be showed by an educated and financialy independent lady, but how many girls are there who are fortunate enough to go to the school? just writing a blog is not enough, we (educated ladies) should come together and do something for our friends. Education and especially Vocational education is must for the girls.

    razia mirza के द्वारा
    May 19, 2010

    yes I agree witha u that we (educated ladies) should come together and do something for our friends. Education and especially Vocational education is must for the girls. your comment will inspire my thoughts. thanks

CHAND AKHTER के द्वारा
May 18, 2010

RAZIA JI ME AAPKI BAAT SE BILKUL SAHMAT HU ME BHI EAK MUSLIM LADKI HU AUR ME YE JANTI HU AGAR HUM LOG IN FATVO ME PAD KAR RAH JAYENGE TO HUM MUSLIM KABHI AAGE NAHI BAD PAYENGE. HUM 3 SISTERS AUR 1 BROTHER HE AAJ SE 20 SAAL PEHLE HAMARE FATHER HUM LOGO KO CHHOD KAR CHALE GAYE AUR UNHONE DUSRI SHADI KAR LI MERI MUMMY PADI LIKHI NAHI THI ISLYE WO KAHI JOB NAHI KAR SAKTI THI MAGAR WO EDUCATION KI VALUE JANTI THI UNHONE SILLAI KAA KAAM KAR KARKE HUM CHARO KO PURI EDUCATION DI AAJ MERI BADI SISTER MEDIA ME HE ME APNA BUSINESS KAR RAHI HU MERI CHHOTI SISTER RANBAXY ME SCIENTIST HE AUR PHD KAR CHUKI HE MERE BHI KI APNI EAK MALL ME 4 SHOPS HE AGAR MERI MUMMY BHI YEHI SOCHTI KI ME JAISE SILLAI KA KAAM KAR RAHI HU YE BHI KARENGI TO AAJ HUM SAB JIS MUKAAM PAR HE KABHI NAHI PAHOCH PATE YE SIRF WO HI JANTA HE JIS PAR BITTI HE AGAR HUM BHI GHAR ME HI REHTE NA KHANE KO SAHI SE ROTI HOTI NA PENNE KO KAPDA HOTA . MERI MUMMY KO JO LADIES KAPDE SILLANE AATI THI KEHTI THI KI AAP IN LADKIYO KO BHI SILLAI ME LAGA LO ZIYADA PAISA KAMAOGI MAGAR MERI MUMMY NE KAHA KI NAHI JO KAAM ME KAR RAHI HU ME NAHI CHAHTI YE BHI KARE ME INKO ITNI EDUCATION DENA CHAHTI HU JITNA YE PADNA CHAHE KYOKI AAJ ME PADI LIKHI NAHI HU YE KAMI MUJHE PATA HE. TO FATVE SAHI HOTE HE MAGAR WO KIS HALAAT ME DIYE JAA RAHE HE WO DEKHNA CHAHIYE KAI BAAR INSAAN JANTA HE KI YE SAHI HE MAGAR USKO DUNIYA ME JEENA HE TO KUCHH CHEEZO KO UNDEKHA KARKE AAGE BADNA PADTA HE YEHI TO ZINDAGI HE JO ALLAH KE UKAM SE HAMARI MUMMY NE HUM LOGO KO DI HE ME HAMESHA US KHUDA KA AUR APNI MUMMY KA SHUKRIYA AADA KARTI HU. TO JO LOB FATVA MAAN SAKTE HE WO MANE JO NAHI MAAN SAKTE UNKO MAJBOOR NA KARE KI WO BHI MANE KYOKI KAI BAAR HALAAT IN FATVO KO MANNE SE INKAAR KAR DETE HE RAZIA JI AAPKA ARTICLE PADEKE BAHUT SARI CHEEZE TAZA HO GAI AAJ HUM LOG BAHUT KHUSH HE HUM SAB EAK HI GHAR ME MILKAR REH RAHE HE HASI KHUSHI THANKS RAZIA JI

    razia mirza के द्वारा
    May 19, 2010

    आपकी बात से मुझे भी मेरी अम्मी याद आ गई। बहन आज हम जो मुकाम पे हैं वो हमारी अम्मी की बदौलत। अनपढ होते हुए वो ऐसी पढी थी कि उसने हमें दीन और दुनिया दोंनो6 तालिम दे रख़्खी थीं। रिश्तेदार तो हमारी पढाई के ख़िलाफ थे। पर वो डटी रहीं। हमें एक सबक़ दे रख्खा था कि इतना पढो कि दुनिया को जुका सको। अपने बेटों से रिश्ता करने के लिये अम्मी को हर तरहा से मज़बूर कर रहे थे लोग। यहाँ तक कहते थे “कौन ले जायेगा ऐसी पढी लिखी को। हमारे यहाँ तो ऐसे लडके नहिं हैं”।अम्मी एक ही बात कहती थी शादी का जोडा तो उपर तय होता है वक़्त आने पर मिल जायेगा अगर नहिं भी मिला तो मेरी बेटीयाँ खुद ईज़्जत से अपनी ज़िन्दगी संवार लेंगी। और आख़िर अम्मी कि महेनत रंग लाई। हमारा रिश्ता एक नवाबी ख़ानदान में हुआ। हमारे ससुर ख़ुद एक आई-ए-एस ओफ़िसर थे। उन्हें भी पढिलिख़ी बहुएं चाहिये थीं। जो हमारी शादी भी हो गई। आज हम बहोत खुश हैं। और आज जो मक़ाम पर हैं एक औरत “अम्मी” की बदौलत हैं। अल्लाह उन्हें जन्नत नसीब करे। आपकी बात पढकर बहोत ही सुकुंन पाया। चाँद बहन आपको और कामयाबी मिले यही मेरी दुआ है। आपने मेरी पोस्त को सराहा आपका बडा शुक्रिया।

muhammad.khalid के द्वारा
May 17, 2010

रज़िया जी अस्सलामुअलेकुम, उम्मीद है खेरियत से होंगी आज आपका लेख पड़ा मालूम हुआ की आप काफी पड़ी लिखी हैं, लेकिन शायद जितनी दुनियावी तालीम आपने हासिल की है उसका शायद ही १० परसेंट दिनी तालीम से आपका वास्ता पड़ा हो, आप को यह मालूम होना चाहिए फतवे का मतलब राये, मशवरा होता है, किसी ने कोई मसला दीनी एतबार से मालूम किया उसका जवाब आलिमों ने कुरान और हदीस की रौशनी में दे दिया इसके ऊपर आप अमल करें या न करें यह आप की मर्ज़ी, इसमें इतना हो हल्ला करने की क्या ज़रूत है हाँ कुछ खास हालत में औरत इस्लामी कानून के दाएरे में रहकर नौकरी या कारोबार कर सकती है क्या आप नहीं जानती हज़रत खदीजा रज़ी० भी एक कामयाब बिज़नस वोमेन थीं,बस आपको और मुस्लिम औरतों को उनको फोल्लो करने की ज़रुरत है ,इस्लाम दुश्मन ताकतें खास तौर से मीडिया को इस्लाम के खिलाफ बोलने,प्रोपगंडा फेलाने का मौका मिलना चाहिए और आप जेसे लोग इस तरह का लेख लिख कर इनकी होसला अफजाई करते हैं.

    razia के द्वारा
    May 17, 2010

    वालैकुम सलाम ख़ालिदसाहब। आपकी कमेंन्ट पढकर पहले तो ये कहना चाहुंगी कि मैं दीनी और दुन्यवी दोनों तालिमे6 ठीक से हासिल कर चुकी हुं। मैं इस्लाम और उसकी हदीस के खिलाफ़ कभी नहि हुं। मैं भी जानती हुं कि फतवे का मतलब राये, मशवरा होता है, किसी ने कोई मसला दीनी एतबार से मालूम किया उसका जवाब आलिमों ने कुरान और हदीस की रौशनी में दे दिया पर उसका ये मतलब तो नहिं कि जैसे चाहे फतवे दें।  आप ही ने कहा है कि”औरत इस्लामी कानून के दाएरे में रहकर नौकरी या कारोबार कर सकती है । अगर फ़तवा देनेवाले यही बात कह देते तो कभी भी मैं ख़िलाफ नहिं थी। आप को मुझे ये बात कहने कि बज़ाय “उन लोगो को कही होती कि भाई फ़तवे तो सोच समजकर दिया करें। रही बात मेरे इमान कि मै ग़ुरुर से कह सकती हुं कि मैं मुस्लिम हुं। पर मेरा ईमान अल्लाह और उसके रसुल को फ़ोलो करता है। ना कि बेतुके लोगो से। मैं अपनी इज्जत से अपने घरबार और नौकरी को संभालती हुं।शायद इसी लिये मैं उनके दरबार में एक नहिं बल्कि चार चार बार सजदा करके आई हुं।  मैं नहिं बल्कि ऐसे फ़तवा देनेवालों ने मीडीया में इस्लाम को बदनाम कर रख़्खा है। शुक्रिया

    Tufail A. Siddequi के द्वारा
    May 17, 2010

    You are very right Razia Ji. Keep it up. Thanks. http://siddequi.jagranjunction.com

    samta gupta kota के द्वारा
    May 18, 2010

    खालिद भाई साहब,कोई भी धर्म इंसानियत के ऊपर नहीं है,मेरा विचार है की धर्म बना ही इंसान की बेहतरी के लिए है और हरेक धर्म के मूल सिद्धांत एक ही हैं,ये तो उस धर्म की मनमानी व्याख्या करनेवाले vested interest है जो अपनी ताक़त को बनाए रखने के लिए कमजोरों को कभी मज़बूत नहीं होने देना चाहते चूँकि इससे उनकी दुकानदारी जो बंद हो जाएगी,हरेक धर्म और समाज में ऐसा ही है,अपनी कमियों को हम नहीं देखेंगे तो उसे सुधारेंगे कैसे,रजिया बहन ने ठीक लिखा है,हम अपने घर में ,घर वालों के साथ ही इन मुद्दों को उठा रहे हैं,क्या हिन्दू धर्म में कमिया नहीं हैं?जो भी पुराना धर्म/मज़हब है उसमे कुरीतियाँ आ ही जाती हैं,हिन्दुओं में जातिवाद,दहेज़,अंधविश्वास जैसी बुराइयों की भी में निंदा करती हूँ और मानती हूँ की सभी को ऊपर वाले ने ही बनाया है तो कोई आपसे कमतर कैसे हो गया?क्या उसके पास पैसे कम हैं इसलिए?या उसके कपडे फटे हैं इसलिए?खालिद भाई मीडिया वाले बुरे करेंगे ये सोचकर क्या हम उन कमियों और जलालतों को धोते रहें?

Tufail A. Siddequi के द्वारा
May 16, 2010

रजिया जी आदाब, ठीक ही लताड़ लगाई है आपने इन मुल्ला क़ाज़ी को. लेकिन इन्हें सर पर बैठने वाले भी तो हम में से ही होते है. काफी लोगों का समर्थन लेने के बाद ही ये मुल्ला काजी फतवा जारी करते है. शुक्रिया. http://siddequi.jagranjunction.com

    razia के द्वारा
    May 17, 2010

    जी हाँ सिद्दीक़ी साहब। आप सही कहते हैं कि “इन्हें सर पर बैठने वाले भी तो हम में से ही होते है. ” पर हम यही सोचकर भी तो नहिं बैठ सकते कि जो हो रहा है ख़ामोशी से सुनते रहो। चाहे इमराना को ईंसाफ मिले ना मिले हमारी रोटीयां तो चलती हैं ये ही सोच आज कमज़ोर करने पर तुली है। हमें हक़ है कि हम सही या ग़लत का फ़रक समजें। शुक्रिया  आपकी कमेन्ट के लिये।

Anuradha chaudhary के द्वारा
May 15, 2010

The society is in developing stage.It is a transition phase.i think it need not to worry.U.P Udai mission

    razia के द्वारा
    May 15, 2010

    yes, it is. thanks for your comment

samta gupta kota के द्वारा
May 14, 2010

रज़िया जी,सच तो ये है की किसी भी समाज मे जो भी लोग,वर्ग शक्तिशाली होता है वो अपनी HEGEMONY को बनाये रखने का प्रयास करता ही है ,ये वर्ग यथा-स्थितिवादी होता है, ये अपने वजूद के लिए बेतुके तर्क भी देता है,अब जो प्रगतिशील धारा है उसे मजबूत होकर बदलाव के प्रयास करने पड़ते हैं,मजबूत वर्ग कमजोरों पर ही हुक्म चलता है, और चला सकता है,अब तो ये है की हरेक बात को तर्क की कसौटी पर कसो और खुद फैसला लो,

    razia के द्वारा
    May 15, 2010

    आपका कहना सही है समताजी कि अब तो ये है की हरेक बात को तर्क की कसौटी पर कसो और खुद फैसला लो, आभार आपके कमेन्ट के लिये।

VIKKY के द्वारा
May 14, 2010

श्री मती रजियाजी, एक उतम लेख के लिए आप बधाई की पात्र है ! ! ! पर मेरा मानना है अगर एक आम हिन्दुस्तानी औरत (खासकर मुस्लिम औरत) की बात कहाँ तक चल पाएगी ? इस सब के लिए आप को शायद अभी तो सुप्पोर्ट मिल जाये पर आगे जाकर ? ? ?… मैं आप को बता दूं कुछ समय बाद यह बात बस आई / गयी हो जाएगी .. जब तक एक औरत अपनी ताकत नहीं पहचानेगी और मिलकर इन दोमुह वाले फतवा निकलने वालो को मुहू तोड़ जवाब नहीं देगी तब तक बस सब ऐसे ही चलता रहेगा. मैं यह सिर्फ आप के धर्म की नहीं पर सब धर्म की माताओ से विनिन्ति करता हूँ की,माताओ जागो और अपनी छुपी हुई ताकत को पहेचानो ! ! ! जागो हिन्दुस्तानियों जागो ! ! !

    razia mirza के द्वारा
    May 14, 2010

    आदरणीय विवेकजी आपके कमेंट के लिये आभार। मैने अपनी पोस्ट में बिल्कुल सरल बात उन लोगों से कहदी है कि क्या वो किसी के घर सालभर का अनाज डाल जाते है ? या बच्चों की फ़ीस जमा करते हैं? या के ईलाज का ख़र्च उठाते हैं? फ़िर क्यों ऐसे बेफ़ुज़ुल फ़तवों को सुना जाये जो फ़त्वों के नाम को बदनाम करते हैं? आप के उत्साह/जोश से दी हुई प्रतिक्रिया के लिये फ़िर से आभार वयक्त करती हुं।

    VIKKY के द्वारा
    May 14, 2010

    बहन रजिया जी, अगर वह किसी के घर सालभर का अनाज डाल जाते है ? या बच्चों की फ़ीस जमा करते हैं? या के ईलाज का ख़र्च उठाते हैं? तब भी एक औरत किसी की गुलाम तो नहीं बन सकती ना ? यह हमारा कर्तव्य है , हमारी समाज के प्रति जिमेदारी है … हम सब को मिलकर (एक जुट होकर) इन मुट्ठी भर लोगों को … (खास कर इन नेताओ को ) सबक सिखाना चाइए तब जाकर हमारे अपने भारत / हिंदुस्तान / इंडिया को हम नई उचाइयो तक पंहुचा सकते है. एक बार फिर से अपनी गरिमा, अपने इस जूनून को कम मत होने दीजियेगा … धन्यवाद् ! ! !

kmmishra के द्वारा
May 14, 2010

कोई समाज कितना विकसित है ये उस समाज की महिलाओं की स्थिति को देखकर पता चलता है । मुस्लिम महिलाओं में साक्षरता की दर जानबूझ कर बहुत कम रखी गयी है । वजह साफ है ताकि वे भेड़ बकरियों सा जीवन जीती रहें । लेकिन लगता है कि अब समय बदल रहा हैं । में तहे दिल से अपके हौसले और जज्बें को सलाम करता हूं ।

    razia mirza के द्वारा
    May 14, 2010

    जी हाँ आप सही फ़रमा रहे हैं कि”मुस्लिम महिलाओं में साक्षरता की दर जानबूझ कर बहुत कम रखी गयी है । वजह साफ है ताकि वे भेड़ बकरियों सा जीवन जीती रहें । आपकी प्रतिक्रिया के लिये आभार।

subhash के द्वारा
May 13, 2010

in faltu fatvon ka virodh karne ke liye salam samaj ko in pando aur mullo se bachana hoga

    razia mirza के द्वारा
    May 14, 2010

    जी हाँ आप बजा फरमा रहे है। आभार आपकी कमेन्ट के लिये।

subodhkantmisra के द्वारा
May 13, 2010

आपने जो तूफान से लड़ने का हौसला दिखाया है उसे सलाम और आपको प्रेरणा देने का जो महान काम आपके पति ने किया है उन्हें भी सलाम !

    razia mirza के द्वारा
    May 14, 2010

    सच कहते हैं आप।  पहले कहते थे न कि एक सफल पति के पीछे उसकी पत्नि का हाथ होता है! आज मेरे इस लेख के प्रेरणास्रोत हैं मेरे पति। आपके बहेतरीन कमेंट के लिये आभार।

footballlover के द्वारा
May 13, 2010

मुस्लिम समाज में फतवें और हिंदु समाज में सरपंची अदालत दो उधारण है जों समाज की कुरूपता का प्रतीक है. आज हम २१वीं सदी में जी रहे है, पर क्या यह मानसिकता २१वीं सदी की है. क्या यह विचारधारा समाज की बदसूरती नहीं प्रस्तुत करती है. पर इससे ज़्यादा मुझे इस बात से नाराज़गी है कि अपने आप को समाजकल्याणी बताने वाले लोग ही इसके लिए जिम्मेदार है.

    razia के द्वारा
    May 13, 2010

    आपकी बात सही है कि समाजकल्याणी बताने वाले लोग ही इसके लिये ज़िम्मेदार हैं। पर यदि लोग ही खुलकर इस ग़लत बात का विरोध करेंगे तभी ऐसे बन बैठे समाजसुधारक आग लगाना भूल जायेंगे।

rachna varma के द्वारा
May 13, 2010

आप जैसे लोगो को ही ऐसे सामने से आकर इन फालतू फतवो का विरोध करने से बहुत कुछ बदला जा सकता है ।

    razia mirza के द्वारा
    May 13, 2010

    आपकी बात सही है फ़ालतु बातों का विरोध कर के ही सब कुछ बदला जा सकता है।

Ram Kumar Pandey के द्वारा
May 13, 2010

बिलकुल जायज और उचित विचारों का प्रदर्शन है आपका. आज कोई भी समुदाय समानता के आधार पर ही भावी चुनौतियों का मुकाबला कर सकता है. वैसे भी ऐसे फतवे सिर्फ यही साबित करते है कि जैसे मुस्लिम स्त्रियाँ अपने चरित्र को स्वयं ही बचा पाने में सक्षम नहीं हैं . इससे ज्यादा घोर अपमान और क्या हो सकता है ?

    razia mirza के द्वारा
    May 13, 2010

    क्यों नहिं? सिर्फ मुस्लिम ही नहिं बल्कि हर स्त्री अपने चरित्र को बचा पाने में सक्षम है। आप की कमेंत सराहनीय है।

manoj के द्वारा
May 13, 2010

रजिया जी, बिलकुल सही कहा मुस्लिम समाज में  फतवें और हिंदु समाज में खाप प ंचायत इन दोंनों से सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या भारत में सिर्फ एक ही कानून चलता है या हिंदु मुस्लिम दोनों के लिए अलग अल्ग कानून होंगे.

    razia mirza के द्वारा
    May 13, 2010

    आप की हर कमेंट मुझे एक नये लेख के लिये ईंन्स्पायर करती रही है। शुक्रिया मनोज जी।

priya के द्वारा
May 12, 2010

महान कृत्य हैं आपके, आपको शत शत नमामि . नारियों के पक्ष में आज कौन पूरी शक्ति से बोल सकता है. धन्य हैं आप जो आपने अपनी गरिमामय उपस्थिति से कृतार्थ किया. कौन है आज जो हमारी आजादी का मुखर समर्थक हो? प्रेरणा देती आपकी ये कृति निसन्देह मुहतोड़ जवाब है दकियानूसों को.

    razia mirza के द्वारा
    May 13, 2010

    प्रिया जी। आपकी कमेंन्ट ने मुझे बहोत ही सराहा है एक महिला होने के नाते आपका ये जवाब मन को छू गया। नि:संदेह हम महिलाएं अपनी रक्षा खुद कर सकती हैं। कोई ज़रूरत नहिं ऐसे दकियानूसों की। पता है आज के लेख को लिखने में मेरा साथी कौन रहा? मेरे पति!! कहने लगे लानत है ऐसे फ़तवाखोरों को। तभी मेरा मन ये पोस्ट लिखने को ज़िद्दी हो चला। आपकी कमेंट के लिये आभार।

    bkhandelwal के द्वारा
    May 15, 2010

    नारी इस desh का सम्मान है इस्सको सलाम कार्यें नारी माँ की मम्मता है बहेन भाई का प्यार है इस का मजाक उद्दण सही नहीं दिन हो रात दुबह्ह हो या साम नारी हो मिल टा rahesammaन fatva ab purna हो गया नया है नारी के काम को इज्ज़त से सरोहाओ usskey रोने से रोको उसको प्यारसे सह्ह्योग दू यही है उसका samman


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