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ओ इन्सान को बाँटनेवालो......

Posted On: 24 May, 2010 में

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unityओ इन्सान को बाँटनेवालो, क़ुदरत को तो बाँट के देख़ो।
ओ भगवान को बाँटनेवालो, क़ुदरत को तो बाँट के देख़ो।

कोई कहे रंग लाल है मेरा, कोई कहे हरियाला मेरा।
रंग से ज़ुदा हुए तुम कैसे ओ रंगों को बाँटनेवालो? ओ इन्सान को….

आसमाँन की लाली बाँटो, पत्तों की हरियाली बाँटो,
रंग सुनहरा सुरज का और चंदा का रुपहरी बाँटो।
मेघधनुष के सात रंग को बाँट सको तो बाँट के देखो। ओ इन्सान को….

आँधी आइ धूल उठी जब, उससे पूछ लिया जो मैने।
कौन देश क्या धर्म तुम्हारा, वो बोली मेरा जग सारा।
मुझ को हवा ले जाये जीधर भी में उस रूख़ पे उडके जाउं।
ना कोइ मज़हब टोके मुझको, ना कोइ सीमा रोके मुझको।
मिट्टी के इस बोल को बाँटो ओ सरहद को बाँटनेवालो… ओ इन्सान को….

नदिया अपने सूर में बहती, गाती और इठ्लाती चलदी।
मैने पूछा उस नदिया से कौन देश है चली किधर तू?
हसती गाती नदिया बोली, राह मिले मैं बहती जाउँ।
ना कोइ मज़हब टोके मुझको, ना कोइ सीमा रोके मुझको।
नदिया के पानी को बाँटो, ओ मज़हब को बाँटनेवालो। ओ इन्सान को….

फ़ुल ख़िला था इस धरती पर, महेक चली जो हवा के रुख़ पर।
मैने पूछा उस ख़ुश्बु से चली कहाँ खुश्बु फ़ैलाकर।
ख़ुश्बु बोली कर्म है मेरा, दुनिया में ख़ुशबु फ़ैलाना।
ना कोइ मज़हब टोके मुझको, ना कोइ सीमा रोके मुझको।
फ़ुलों की ख़ुश्बु को बाँटो, ओ गुलशन को बाँटनेवालो। ओ इन्सान को….

उडते पँछी से जो मैने पूछ लिया जो एक सवाल।
कौन देश क्या धर्म तुम्हारा, हँस के वो ऐसे गया टाल!
पँछी बोला सारी धरती, हमको तो लगती है अच्छी।
ना कोइ मज़हब टोके मुझको, ना कोइ सीमा रोके मुझको।
आसमाँन को बाँट के देख़ो, उँचनीच को बाँटनेवालो। ओ इन्सान को….

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

samta gupta kota के द्वारा
May 28, 2010

रजिया जी,बहुत अच्छा,इंसानियत की लौ जलाये रखिये, देखते हैं अँधेरा कब तक नहीं भागता?एक शेर याद आ रहा है,यूँ तो लाखों सालों से है इस जमीन पर इंसान का वजूद,फिर भी तरस जातीं हैं ऑंखें,देखने इक इंसान को,

    razia mirza के द्वारा
    May 28, 2010

    Thank-u samtaji

anuradh chaudhary के द्वारा
May 26, 2010

Its a nice post.nature can not be divided. this is the truth.selfish human beings for their benefits.

    razia mirza के द्वारा
    May 27, 2010

    Thank you Anuradhji for your comment.

sunny rajan के द्वारा
May 25, 2010

हे मनुष्य तू ही तो है जो बटवारा करता है, इंसानियत बाटता है, धर्म के नाम पर बटवारा करता है नदिया बाटता है . क्या मिलता है तुझे यह करने से.

    razia mirza के द्वारा
    May 25, 2010

    aapka kahna bilkul sahi hai .yadee manushya hi ye samajle to bahetar hai

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
May 24, 2010

बहुत अच्छी लगी आपकी ये कविता. …….

    razia mirza के द्वारा
    May 25, 2010

    Thanks

Tufail A. Siddequi के द्वारा
May 24, 2010

आदाब, बहुत अच्छी कविता लिखी है आपने. खुदा ने तो ये जहाँ एक बनाया और इसे रंग-बिरंगा तथा विविधता भरा बनाया लेकिन इंसानों ने धर्म-जात की दीवारे बनायीं, रंग-भेद की सीमायें खींची. नसीहत देती कविता है. शुक्रिया.

    razia mirza के द्वारा
    May 25, 2010

    Shukriya Tufail sahab , aapne meri har post ko saraha hai.


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