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बचपन हॉ हॉ ये बचपन।

Posted On: 10 Jun, 2010 Others,लोकल टिकेट में

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बचपन हॉ हॉ ये बचपन।
नादान भोला ये बचपन।
कहीं ऑसु से भीगा ये बचपन।
कहीं पैसों में भीगा ये बचपन।
धूल-मिट्टी में खोया ये बचपन।
फ़ुटपाथसडक पर संजोया ये बचपन।
रेंकडी पर जुतों की पोलिश पर चमकता ये बचपन।
कहीं कुडेदान में खेलता ये बचपन।
कहीं गरम सुट में घुमता ये बचपन।
कहीं फ़टे कपडों में नंगा घुमता ये बचपन।
कहीं मर्सीडीज़ कारों में घुमता ये बचपन।
कहीं कारो  के शीशे पोंछता  ये बचपन।
कहीं मेगेज़ीन बेचता ये बचपन।
कही  महेलों में   झुलता ये बचपन।
कहीं फ़टी साडी में झुलता ये बचपन।
कहीं केडबरीज़ के  रेपर में खोया ये बचपन।
कहीं सुख़ी रोटी की पोलीथीन में खोया ये बचपन।
कहीं एरोड्राम पर टहलता ये बचपन।
कहीं नट बनकर दोरी पर चलता ये बचपन।
पर……
कहीं बाई के हाथों में पलता ये बचपन।
तो कहीं ममता की छाया में संभलता ये बचपन।
बचपन हॉ हॉ ये बचपन।

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aditi kailash के द्वारा
June 10, 2010

आपका फिर से स्वागत है…….कहाँ चली गई थी आप………अच्छी रचना………..बधाई…..

    razia mirza के द्वारा
    June 11, 2010

    मेरी गेरहाज़री पर ध्यान देनेके लिये शुक्रिया । मेरे पिताजी का देहांत होने कि वजह से नेट पर आ नहिं पाई। कमेंट के लिये आभार।


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