मेरी आवाज सुनो

मेरी आवाज़ ही पहचान है॥

88 Posts

766 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1412 postid : 128

मेरे "बाबा"

Posted On: 12 Jun, 2010 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

धक..धक..धक..धक… मौत का काउनडाउन शुरु हो चुका था।

मेरे “बाबा”(पिताजी) हम सब को छोडकर दुनिया को अलविदा कहने चले थे।

अभी सुबह ही तो मैं आईथी आपको छोडकर “बाबा”

मैं वापस आने ही वाली थी। और जीजाजी का फोन सुनकर आपके पास आ भी गई। आपके सीनेपर मशीनें लगी हुईं थीं।

आप को ओकसीजन की ज़रुरत थी शायद ईसीलिये। फ़िर भी आप इतने होश में थे कि हम तीनों बहनों और भाइ को पहचान रहे थे। आई.सी.यु में किसी को जाने कि ईजाज़त

नहिं थी ।

….पर “बाबा” हमारा दिल रो रहा था कि अभी एक ही साल पहले तो मेरी “अम्मी” हमें छोडकर जहाँ से चली गई थीं । आप हम सब होने के बावज़ुद तन्हा ही थे। हम सब मिलकर आपको सारी

खुशियों में शरीक करते पर “बाबा” आप !!हर तरफ मेरी “अम्मी” को ही ढूंढते रहते थे। आपको ये जहाँ से कोई लेना देना ही नहिं था मेरी “अम्मी” के जाने के बाद।

क्या “बाबा” ये रिश्ता इतना ग़हरा हो जाता है?

मुझे याद है आप दोनों ने हम तीनों बहनों को समाज और दुनिया कि परवा किये बिना ईतना पढाया लिखाया । लोग हम बेटीयों को पढाने पर ताने देते रहते थे आप दोनों को।

पर आप और अम्मी डटे रहे अपने मज़बूत ईरादों पर। यहाँ तक की आप ने हमारी जहाँ जहाँ नौकरी लगी साथ दिया। आपको तो था कि हमारी बेटीयाँ अपना मकाम बनायें।

और “बाबा” आप दोनों कि महेनत रंग लाई। हम तीनों बहनों और भाई सरकारी नौकरी मे अव्वल दर्जे के मकाम पर आ गये। शादीयाँ भी अच्छे ख़ानदान में हो गईं।

समाज को आपका ये ज़ोरदार जवाब था। आप दोनों महेंदी कि तरहाँ अपने आपको घीसते रहे और हम पर अपना रंग बिखरते रहे । अरे आप दोनों दिये कि तरहाँ जलते रहे |

और …हमारी ज़िन्दगीयों में उजाला भरते रहे। आप की ज़बान पर एक नाम बार बार आता रहा “मुन्ना” ! हम तीनों बहनों का सब से छोटा भाई।!बाबा” हमारे छोटे भाई”मुन्ना” ने भी आप को

बचाने के लिये बहोत कोशिश की है।

“बाबा” हमें थोडी सी ठोकर लगती आप हमें संभाल लेते। आप पर लगी ये मशीनरी मेरी साँसों को जकड रही थी। और आप हमारा हाथ मज़बूती से पकडे हुए थे कि

हम एकदूसरे से बिछ्ड न जायें। मौत आपको अपनी आग़ोश में लेना चाहती थी। हम आपको ख़ोना नहिं चाहते थे। “बाबा” आपकी उंगलीयों को पकड्कर अपना बचपन

याद कर रही थी मैं। वही उंगलीयों को थामे हम आज इस राह पर ख़डे हैं। आप दोनों ने हमारे लिये बडी तकलीफ़ें झेली हैं। आप हमें अपनी छोटी सी तंन्ख़्वाह में भी

महंगी किताबें लाया करते थे।

आपकी भीगी आँखों में आज आंसु झलक रहे थे। बारबार हम आपकी आँखों को पोंछ्ते रहे। नर्स हमें बार बार कहती रही कि बाहर रहो डोकटर साहब आनेवाले हैं।

मुझे गुस्सा आ रहा था कि आपको डीस्चार्ज लेकर घर ले जाउं कम से कम आपको तन्हाई तो नहिं महसूस होगी। हम दो राहे पर थे या तो आपकी जान बचायें या फ़िर आपके पास रहें।

धक..धक..धक.. में आप खामोश हो गये थोडी देर आँखें खोलकर बंद कर लीं आपने। हमें लगा आप सो रहे हैं ।

पर…. डोकटर ने आकर कहा ” He is expired”

आप हमें छोडकर आख़िर “अम्मी” के पास पहोंच ही गये। “बाबा” आपकी तस्वीर जो पीछ्ले साल ली गई थी मेरे पास है आप “अम्मी” की क़ब्र पर तन्हा बैठे हैं|

baabaa

आज आपको भी बिल्कुल “अम्मी” के पास ही दफन कर आये हैं हम। आपकी यादें हैं हमारे लिये “बाबा” यह लिखते हुए मेरी आँख़ों के आगे आँसुओं कि चिलमन आ जा रही है।

छीप छीपकर पोंछ रही हुं ताकि कोई मुझे रोता हुआ देख न ले। ये कैसी विडंबना है “बाबा”!!!!

आज की यह पोस्ट मेरे “बाबा” को समर्पित है। आज की पोस्ट का नंबर से कोई संबंध नहिं है। जागरण जंकशन के माध्यम से मैंने अपना “मन” और” दर्द”बांट लिया है

पाठकों के साथ।

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 4.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

8 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

navneet sharma के द्वारा
June 14, 2010

किसकी सुबह तैयारी, कोई शाम का है राही…। रजि़या जी, बाबाओं को रोकना आसान होता तो मैं 30 अप्रैल 1996 को अपने बाबा को भी रोक लेता जब उन्‍होंने मेरी गोद में आखिरी हिचकी ली थी। वो मौत से एक दिन पहले मुझे अपनी ग़ज़ल का शे’र सुना रहे थे : साग़र हिस्‍सार-ए-ज़ात से छूटा तो यूं लगा इक उम्रकैद काट के घर आ गया हूं मैं। आपके वालिद मोहतरम नहीं रहे, मुझे भी दुख हुआ लेकिन यही दुनिया-ए-फ़ानी का यही कानून है।

    razia mirza के द्वारा
    June 14, 2010

    नवनीत शर्मा जी । आपकी कमेन्ट ले लिये आभार। संवेदनाओं में साथ निभाने का शुक्रिया।

RASHID के द्वारा
June 14, 2010

रज़िया जी सभी जानदारो को मौत का मज़ा चखना है! बस अब आपके वालिद के लिए सब से अच्छा तोहफा है कि जितना हो सके उनके नाम से सवाब के काम करे ! मरने के बाद सिर्फ यही रूह को फायेदा देता है! RASHID http://rashid.jagranjunction.com

    razia mirza के द्वारा
    June 14, 2010

    आपका बहोत बहोत शुक्रिया मेरे ग़म में शरीक होने के लिये।

allrounder के द्वारा
June 12, 2010

रज़िया जी आपके पिताजी के इंतकाल की बात जानकार बहुत दुःख हुआ, मगर क्या करें यही प्रकृति का नियम है, यही इश्वर की इच्छा ! इश्वर आपके पिताजी की आत्मा को शांति और आप के परिवार को इस मुश्किल घडी से लड़ने की शक्ति दे !

    razia mirza के द्वारा
    June 12, 2010

    आभार आपकी प्रतिक्रिया के लिये। आप ने मेरे दर्द को बांट लिया ये कहकर कि ये प्रकृति का नियम है।

aditi kailash के द्वारा
June 12, 2010

रज़िया जी, आपके बाबा के इंतकाल की खबर सुनकर दुःख हुआ………भगवान उनकी आत्मा को शांति दे……..

    razia mirza के द्वारा
    June 12, 2010

    अदीतिजी आप मेरे दर्दमें हमदरद  रहे आपका शुक्रिया।


topic of the week



latest from jagran