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फ़िर कोख में क्यों मार दी जाती है बेटियाँ।

Posted On: 14 Jun, 2010 Others,लोकल टिकेट में

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girl

घर में जो हँसती खेलती आती है बेटियाँ।

लक्ष्मी को साथ ले के ही आती है बेटियाँ।

आने से उनके घर हमें लगता है स्वर्ग-सा।

संसार में मध घोलती जाती है बेटियाँ।

त्यौहार हो या पर्व हो आता निखार जो।

रंगों से गीतमाला से लाती है बेटियाँ

बचपन से जो जवानी तक कदम बढे चले

माँ बाप का हर वादा निभाती है बेटियाँ।

बाबुल के घर से चल पडी ससुराल कि तरफ।

छुपछुप के रोती  हमको रुलाती है बेटियाँ।

थक जाये गर जो माँ कभी दिनभर के काम से।

माँ की बगल में सो के सुलाती है बेटियाँ।

माँ-बाप को बुख़ार जो आ जाये एक दिन

गीतों में अपना प्यार सुनाती है बेटीयाँ।

ग़र बेटियाँ “महान” है रज़िया की नज़र में।

फ़िर कोख में क्यों मार दी जाती है बेटियाँ।

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shab के द्वारा
March 1, 2011

घर में जो हँसती खेलती आती है बेटियाँ….वाह बिलकुल सही लिखा है आपने…बहुत बधाई…

samta gupta kota के द्वारा
June 22, 2010

ये सामाजिक कुरीतियाँ जिम्मेदार हैं रजिया जी इसके लिए,नहीं तो बेटियां न हो तो दुनियां भी न हो,

    razia mirza के द्वारा
    June 22, 2010

    सही कहा आपने समताजी।

राजेश, भागलपुर के द्वारा
June 22, 2010

आपकी नजर से मैं भी इत्‍तफाक रखता हूं। दुआ करता हूं इस वास्‍तविकता को लोग समझें।  भावपूर्ण प्रस्‍तुति के लिए धन्‍यवाद।

    razia mirza के द्वारा
    June 22, 2010

    शुक्रिया राजेशजी।

R K Khurana के द्वारा
June 14, 2010

बहुत सुंदर कविता ! शुभकामनायें राम कृष्ण खुराना

    razia mirza के द्वारा
    June 14, 2010

    आपकी कमेन्ट के लिये आभार ख़ुरानाजी।


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