मेरी आवाज सुनो

मेरी आवाज़ ही पहचान है॥

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उसे तलाश करो.......

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सफर में ख़ो गई मंज़िल,उसे तलाश करो।.
किनारे छूटा है साहिल, उसे तलाश करो।.

था अपना साया भी इस वक़्त साथ छोड़ गया।
कहॉ वो हो गया ओझल उसे तलाश करो।

ना ही ज़ख़म,ना तो है खून फिर भी मार गया।
कहॉ छुपा है वो कातिल, उसे तलाश करो।

भूला चला है वक़्त जिन्दगी के लम्हों को।
मगर धड़कता है क्यों दिल? उसे तलाश करो।

ये कारवॉ है तलाशी का, लो तलाश करें।
लो हम भी हो गये शामिल, उसे तलाश करो।

वो बोले हम है गुनाहगार उनके साये के।
कहां पे रह गये ग़ाफिल उसे तलाश करो।

लूटा दिया था हरेक वक़्त उनके साये में।
मगर नहिं है क्यों क़ाबिल, उसे तलाश करो।

समझ रहे थे ज़माने में हम भी कामिल हैं।
हमारा खयाल था बातिल उसे तलाश करो।

अय “राज” खूब तलाशी में जुट गये तुम भी।
बताओ क्या हुआ हॉसिल? ,उसे तलाश करो।

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

R K KHURANA के द्वारा
June 22, 2010

बहुत सुंदर रजिया जी ! मेरी शुभकामनायें ! राम कृष्ण खुराना

    razia mirza के द्वारा
    June 23, 2010

    शुक्रिया खुरानाजी।

राजेश, भागलपुर के द्वारा
June 22, 2010

वाकई आपकी आवाज आपकी पहचान है क्‍योंकि अपनी भावानाओं की आवाज को शब्‍दों में पिरोने की आपकी क्षमता लाजवाब है।

    razia mirza के द्वारा
    June 22, 2010

    राजेशजी!! हर पोस्ट पर दिइ हुई आपकी कमेंट मेरे शब्दों को और भी ज़्यादा सुनहरे बनाती चली है।

NIKHIL PANDEY के द्वारा
June 20, 2010

बहुत खूब,,,, क्या कहने अच्छी ग़ज़ल है..

    razia mirza के द्वारा
    June 22, 2010

    बहोत बहोत शुक्रिया निखिलजी।


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