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..........प्रहर हो चली है....

Posted On: 23 Jun, 2010 Others,लोकल टिकेट में

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अंधेरे हैं भागे प्रहर हो चली है।

परिंदों को उसकी ख़बर हो चली है।

सुहाना समाँ है हँसी है ये मंज़र।

ये मीठी सुहानी सहर हो चली है।

कटी रात के कुछ ख़यालों में अब ये।

जो इठलाती कैसी लहर हो चली है।

जो नदिया से मिलने की चाहत है उसकी।

उछलती मचलती नहर हो चली है।

सुहानी-सी रंगत को अपनों में बाँधे।

ये तितली जो खोले हुए पर चली है।

है क़ुदरत के पहलू में जन्नत की खुशबू।

बिख़र के जगत में असर हो चली है।

मेरे बस में हो तो पकडलुं नज़ारे।

चलो ”राज़” अब तो उमर हो चली है।

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

R K KHURANA के द्वारा
June 23, 2010

प्रिय रज़िया जी, आपकी एक और सुंदर कविता पढ़ कर बहुत अच्छा लगा ! आपके लेखन मैं एक कशिश है ! मन बार बार पढने को करता है ! आप अच्छे संकेत देकर लिखती है जो सराहनीय हैं ! कविता की गहरी समझ है आपको ! बहुत सुंदर ! हाँ में पूछना चाहता था कि आप कभी अपना निक नेम “राज” लिखती हैं कभी “रज़िया” क्यों ? राम कृष्ण खुराना

    razia mirza के द्वारा
    June 24, 2010

    बहोत बहोत शुक्रिया खुरानाजी जो आपने मेरी रचनाओं को गहराई से समज़ा है। जी हाँ कभी अपना तख़ल्लुस “राज़” देती हूं कभी “रज़िया” वो इसलिये कि शे’र की मात्रा के साथ जो फ़िट बैठता है वही लिखती हूं। ताकि मेरे गीत/ या गजल को आसानी से तरन्नुम में गा सकुं।

samta gupta kota के द्वारा
June 23, 2010

‘मेरे बस में हो तो पकद्लूं नज़ारे,चलो राज अब तो उमर हो चली है’,रज़िया जी हमारे सबके दिल में एक बच्चा हमेशा रहता है उसे मरने नहीं देना चाहिए, बहुत अच्छी कविता

    razia mirza के द्वारा
    June 24, 2010

    शुक्रिया। आपकी कमेंट के लिये।

Nikhil के द्वारा
June 23, 2010

‘गीत का संगीत’, लिए हुए, एक अच्छी रचना.

    drsinwer के द्वारा
    June 23, 2010

    आपने कविता तो बहुत अच्छी लिखी आप कवियत्री है या लिखने का सोख है


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