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“हम गिर जायेंगे बेटा!!

Posted On: 25 Jun, 2010 Others,लोकल टिकेट में

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मैं गिर जाउंगा पापा मुझे सहारा दो ना!

ना बेटा! डरो मत !

देखो ऐसे सहलाते हैं इन्हें।

ये तो ऊंची नस्ल का घोड़ा है। पापा ने अपने डरे हुए 10 साल के बेटे हौसला दिया।

पाँच साल बाद…..

पापा कल मेरी 10वीं बोर्ड का पहला पेपर है। आप आयेंगे न मेरे साथ?

अरे बेटा!! मैंने तो पूरे 15 की छुट्टी ले रक्खी है। गभराते क्यों हो? तूम्हारी मम्मी और मैं हम दोनों तुम्हारे परीक्षा केन्द्र आयेंगे। जब तक तुम्हारा

इम्तिहान खत्म नहिं हो जाता हम वहां बैठे ही रहेंगे।

और पाँच साल बाद…….

“पापा! सभी के पास मोटरबाइक है। मुझे भी चाहिये। मुझे शर्म आती है अपने दोस्तों के बीच। हर बार किसी से मांगता रहता हूं”।

“बेटा कल ही मैं अपने प्रोवीडंट फ़ंड में अरज़ी लिख देता हूं। एक हफ़्ते में फ़ंड मिल जायेगा। तुम खरीद लेना अपनी पसंद की बाइक”।

पाँच साल और…..

.पापा ये सुनिता है। मेरी ओफिस में ही काम करती है। बहोत अच्छी लड़की है। मैं शादी करना चाहता हूं इससे”।

“अब तुम बड़े हो गये हो। तुम्हें उसके साथ जिन्दगी निभानी है। अगर तुम्हें पसंद है तो हमारी भी खुशी तुम्हारे साथ ही है”।

एक साल बाद……

”बेटा! तूम्हारी माँ मुझे बीमार-सी लगती है। अस्पताल ले जाओ ज़रा। आज छुट्टी रख दो”।

‘क्या बात करते हो पापा! आज मेरी कंपनी में मेनेजींग डिरेकटर आ रहे हैं। मैं नहिं जा सकता। आप ही चले जाओ”।

अच्छा ठीक है मैं चला जाताहुं। ज़रा सहारा देकर हमें ख़डा तो करो।

“अब बस भी करो पापा!! आप लोग इतने भी कमज़ोर नहिं हो कि ख़डे न हो पाओ”।

“हमें संभालो बेटा!!! हम लोगों में अब उतरता हुआ ख़ुन है। आज हम कमज़ोर हैं। हमें सहारे की जरूरत है।

“हम गिर जायेंगे बेटा!!

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

chaatak के द्वारा
June 25, 2010

रज़िया जी, बच्चों के हक़, बच्चों की आज़ादी, बच्चों का प्यार बच्चों का अधिकार, माता-पिता का जुल्म और जाने क्या-क्या बकवास पढ़ते-पढ़े और उन पर चिक-चिक (कमेन्ट) करते दिमाग का दही बन गया था | आज आपका लेख पढ़ के इतना अच्छा लगा के क्या बताएं | कोई तो है जो ये भी समझ रहा है के माता-पिता के साथ जो दुर्व्यवहार हर तीसरे चौथे माडर्न घरों में हो रहा है वो भी एक दर्द है | माता-पिता का ये दर्द वहां तो सारी पराकाष्ठाएं पार कर जाता है जहाँ उनकी आमदनी शून्य हो | इतना अच्छा लेखह लिखने के लिए धन्यवाद !

    razia mirza के द्वारा
    June 25, 2010

    आभार आपका जो आपने मेरे लेख को इतना सराहा। सही मायने में तो आप जैसे प्रतिक्रिया देनेवालों से ही मुझे इन्स्पीरेशन मिलता है।

R K KHURANA के द्वारा
June 25, 2010

प्रिय रज़िया जी, मैं आपकी भावनाओ की कद्र करता हूँ ! राम कृष्ण खुराना

    razia mirza के द्वारा
    June 25, 2010

    शुक्रिया खुरानाजी।

samta gupta kota के द्वारा
June 25, 2010

रजिया जी,आपकी भावनाओं में सामाजिक सरोकार मिलता है इसलिए आपके ब्लॉग का मुझे बेसब्री से इंतज़ार रहता है,हम जैसा व्यव्हार अपने घर के और बाहर के बुजुर्गों से करते हैं वो एक संस्कार के रूप में हम अपने बच्चों को देते हैं,पिछली पीढ़ी के साथ हमारी पीढ़ी का जो व्यव्हार रहेगा यकीन मानिए वोही हमें अगली पीढ़ी से मिलना है,ये नई पीढ़ी कमोवेश पैसों और भौतिकता को भावनाओं से ज्यादा तवज्जो देने वाली है तो उन्हें भी यही चीजें return गिफ्ट मिलेंगी,अभी सच में सांस्कृतिक पुनर्जागरण की जरूरत है चूँकि ये हमारी भारतीय संस्कृति की चीजें न होकर पश्चिमी सभ्यता की हैं,इसलिए सांस्कृतिक पुनर्जागरण चाहिए जिससे हम अपने संस्कारों को अपने कर्मों से प्रसारित कर सकें,लेकिन आज इन \’फालतू चीजों\’ के लिए फुरसत किसे है,लोग अपने बूढ़े माँ-बाप को घर से निकल देते हैं,और घर में भी उनसे सम्मान से व्यव्हार नहीं करते,वास्तव में ये बुराइयाँ \’नए पैसेवालों\’जिन्हें neo -elite भी कह सकते हैं में ज्यादा दिखती हैं,वो एक कहावत है न\’अध जल गगरी छलकत जाय\’

    razia mirza के द्वारा
    June 25, 2010

    जी हाँ समताजी जैसे आपको मेरी पोस्ट का इंतेज़ार रहता है वैसे ही मुझे भी आपकी कमेंन्ट का बेसब्री से इंतेज़ार रहता है। मेरी लगातार कोशिश रहती है कि मैं अपने ब्लोग पर ज़्यादा से ज़्यादा पोस्ट में सत्यघटनाओं को ला सकुं। और आपकी हर प्रतिक्रिया मेरी यह कोशिश को बढावा देती है। तहे दिल से आभार।

R K KHURANA के द्वारा
June 25, 2010

प्रिय रज़िया जी, आपकी रचना पढ़ी ! लेकिन मुझे इसमें वो धार दिखाई नहीं दी जो आपकी कविताओं में है ! वो पैनापन, वो चुभन नहीं नज़र आई ! कुछ कमी सी खटक रही है ! लगता है आप कहानी को समाप्त करने में जल्दी कर गयी ! वो तीखापन नहीं आ पाया ! माफ़ करना हो सकता है मैं गलत होऊं ! जो मुझे लगा मैंने आपको कह दिया ! आप इससे अच्छा लिख सकती है ! कृपया अन्यथा न लेना ! राम कृष्ण खुराना

    razia mirza के द्वारा
    June 25, 2010

    जी हाँ। मैं और भी लिख/कह सकती थी। पर मैं अपने को संभाल नहिं पाई। मुझे लगा ये मेरे अपनों से ही हो रहा है क्या? इस कश्मकश में मैंने रो दिया। आप सही कह रहे हैं। मैं आपको कभी गलत नहिं मानती। कहते हैं ना विवेचक से ही हमें सही राह मिल जाती है। आभार। हंमेशाँ सही/ गलत मुझे बताते रहना। तभी मेरी कलम सही को जांच पायेगी।

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
June 25, 2010

जी बहुत अच्छा लेख लिखा है आपने ………………. आजकल बच्चों में माता-पिता द्वारा उनके द्वारा बच्चों के लिए किये गए कार्य, और बलिदान को माता पिता का कर्तव्य बताने और माता पिता के लिए किये गए कार्य को अपनी उदारता की दृष्टि से देखने की भयावह प्रवित्ति का विकास हुआ है……………………… जिसके गंभीर परिणाम आ रहे हैं और, और भी सामजिक और वैचारिक पतन अवश्यम्भावी है, यदि इस पर समय रहते नियंत्रण नहीं पा लिया गया………… आप इतने अच्छे लेख के लिए मेरा धन्यवाद एवं हार्दिक बधाई स्वीकार करें……….

    razia mirza के द्वारा
    June 25, 2010

    शैलेशजी आपने मेरे इस लेख को सराहा आभार व्यक्त करती हूं। हम जो महसूस करते हैं लिखते हैं। यदि हमारी भावनाएं ही खो जायें तो क्या? हम भी ऐसे मुकाम पर आने ही वाले हैं । हमारे बच्चे भी हमें ओब्ज़ेर्व करते रहते हैं। आपकी प्रतिक्रिया के लिये आभारी हूं।

Nikhil के द्वारा
June 25, 2010

रज़िया दीदी, पापा कe पास जा रहा हूँ… बहुत ही अछि रचना…

    razia mirza के द्वारा
    June 25, 2010

    बहोत अच्छे। चलो मेरी ये रचना कामयाब तो होने लगी। ये सही हक़ीक़त है जो हमारे आसपास बनती रहती है। निखिल भैया आपकी कमेंट के लिये शुक्रिया।


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