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......उसी वक्त को तूँ याद न कर

Posted On: 26 Jun, 2010 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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51by8k_th

जो चला वक्त  उसी वक्त को तूँ याद न कर।

बीती पलकों में यूं ही जिन्दगी बरबाद न कर।

भूल जा भूले हुए रिश्तों को जो छोड़ चले।

उनकी यादों की ज़हन में बडी तादाद न कर।

ना मिलेगा तुझे ये बात कहेगा सब को।

अपने दर्दों की परायों से तूं फरियाद न कर।

जो नहिं उसके ख़ज़ाने में तुझे क्या देगा?

ना दिलासा ही सही उससे युं इमदाद न कर।

”राज़”जब कोई गज़ल छेड दे ज़ख़्मों को तेरे।

तूं  उसी शे’र के शायर को ही इरशाद न कर।

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
June 26, 2010

दिन के ढल जाने पे रोने की कोई रश्म नहीं | अब्र-ए-बहारां बुलाकर अभी बरस्सत कर || आईने में जो आज हकीकत है समझ ले | यूं बीते वक़्त की तस्वीर से इकरार न कर || आपने बहुत अच्छी ग़ज़ल लिखी है ……………… पढ़ के अच्छा लगा ऊपर मैंने आपकी बात आगे बढ़ने की कोशिस की थी अच्छी लगें तो अपनी ग़ज़ल में शामिल कर लें …….

    razia mirza के द्वारा
    June 27, 2010

    शुक्रिया । मेरी गज़ल पर प्रतिक्रिया के लिये शैलेशजी। और हाँ आपके शे’र भी बहोत पसंद आये अपनी गज़ल में शामिल करने के लिये पहले से ही इजाज़त देने के लिये शुक्रिया।

Tufail A. Siddequi के द्वारा
June 26, 2010

aapki kavita padhkar chandan das ki gayi huyi ek gazal yaad aa gai, jiski panktiya hai- “dard ko dil mei basaana chahiye, rote-rote muskurana chahiye.”

    razia mirza के द्वारा
    June 26, 2010

    शुक्रिया सिद्दीक़ी साहब। आपकी कमेंन्ट का और एक बहेतरीन शे’र के लिये।

jalal के द्वारा
June 26, 2010

बहुत अच्छी बात कही आपने. शुक्रिया

    razia mirza के द्वारा
    June 26, 2010

    शुक्रिया जलालसाहब आपकी कमेन्ट के लिये।

Nikhil के द्वारा
June 26, 2010

रज़िया दीदी एक के बाd एक बेहतरीन नगमें. पढ़कर मन बहुत प्रसन्न हो जाता है.. आपको बधाई..

    razia mirza के द्वारा
    June 26, 2010

    निखिल भैया आपका बहोत आभार\ आप मेरी हर रचना को सराहते रहे हो।

R K KHURANA के द्वारा
June 26, 2010

प्रिय रज़िया जी, जो नहीं उसके खजाने में तुझे क्या देगा ? बहुत सुंदर कविता है ! कहा है ना “जाती हुई डोली को न आवाज लगा – इस गाँव में सब आए हैं जाने क लिए ! सुंदर रचना ! राम कृष्ण कहुराना

    razia mirza के द्वारा
    June 26, 2010

    बहोत बहोत शुक्रिया खुरानजी। मेरी हर पोस्ट पर आपकी कमेन्ट मेरी होसला अफज़ाई करती है।

राजेश, भागलपुर के द्वारा
June 26, 2010

आपकी गजल में एक सीख है, एक सच्‍चाई है लेकिन वक्‍त को भुलना असान भी नहीं है। खैर कोशिश तो करनी ही चाहिए आने वाले सुखद कल के लिए।

    razia mirza के द्वारा
    June 26, 2010

    शुक्रिया। राजेशजी इस गज़ल कि प्रतिक्रिया के लिये। जी हाँ वक़्त को भूलाया नहिं जा सकता ये भी तो एक सच्चाई है।


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