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.....मुझे आज मेरा वतन याद आया....

Posted On: 1 Jul, 2010 Others,लोकल टिकेट में

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india

मेरे ख्वाब में आके किसने जगाया।

मुझे आज मेरा वतन याद आया।

जो भुले थे वो आज फिर याद आया।

मुझे आज म्रेरा वतन याद आया।

वो गांवों के खेतों के पीपल के नीचे।

वो नदीया किनारे के मंदिर के पीछे।

वो खोया हुआ अपनापन याद आया।

मुझे आज मेरा वतन याद आया।

वो सखियों सहेली कि बातें थीं न्यारी।

वो बहना की छोटी-सी गुडिया जो प्यारी।

वो बचपन की यादों ने फिर से सताया।

मुझे आज मेरा वतन याद आया।

वो भेडों की,ऊंटों की लंबी कतारें।

वो चरवाहों की पीछे आती पुकारें।

कोई बंसरी की जो धून छेड आया।

मुझे आज मेरा वतन याद आया।

वो बाबुल का दहेलीज पे आके रूकना।

वो खिड़की के पीछे से भैया का तकना।

जुदाई की घडीयों ने फिर से रुलाया।

मुझे आज मेरा वतन याद आया।

मेरे देश से आती ठंडी हवाओ,

मुझे राग ऐसा तो कोई सुनाओ।

जो बचपन में था मेरी माँ  ने सुनाया।

मुझे आज मेरा वतन याद आया।

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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ajit Vanjani के द्वारा
July 10, 2010

hi, Mirza ben Very nice poem,

mukesh के द्वारा
July 2, 2010

Hi Your poem is so natural and touch the soul Thanks for good creation Mukesh

    razia mirza के द्वारा
    July 3, 2010

    Thanks Mukeshji

ashutosh के द्वारा
July 2, 2010

रज़िया दीदी बहुत ही सुन्दर कविता / जय हीन्द !!!!!!!!!

    razia mirza के द्वारा
    July 3, 2010

    शुक्रिया आपका  । जय हिन्द।

Nikhil के द्वारा
July 1, 2010

मैं मिश्र जी बातों से बिलकुल सहमत हूँ. अछि कविता के लिए बधाई रज़िया दीदी.

    razia mirza के द्वारा
    July 1, 2010

    शुक्रिया निखिलभैया

kmmishra के द्वारा
July 1, 2010

आपकी कविता पढ़ कर काबुलीवाला फिल्म का गाना “ऐ मेरे प्यारे वतन” याद आ गया । सुंदर कविता । आभार ।

    razia mirza के द्वारा
    July 1, 2010

    शुक्रिया। मिश्राजी आपकी कमेन्ट के लिये।

sumityadav के द्वारा
July 1, 2010

बहुत ही बढ़िया रचना रजिया जी। वतन से जुड़ाव कराती हर एक चीज को आपने बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत किया। बधाई।

    razia mirza के द्वारा
    July 1, 2010

    शुक्रिया सुमितजी।

razia mirza के द्वारा
July 1, 2010

जी शुक्रिया। वतन कि महोब्बत ही ऐसी होती है। ये सच्चाई है हमारे गाँव की एक लडकी कि शादी परदेश में होने के बाद मैंने उस घटना को कविता का रुप दे दिया। उस के भाई और माँ बाप का सचित्र वर्णन किया है मैंने अपनी इस गज़ल में।

RAASHID के द्वारा
July 1, 2010

रज़िया जी,, आप तो वतन ही में रहती है लेकिन आप की कविता ने मुझ जैसे वतन से दूर रहने वालो को ज़रूर रुला दिया,

    razia mirza के द्वारा
    July 1, 2010

    शुक्रिया रशीदसाहब। मैंने आपकी कमेंट के जवाब को गलती से अपने ही कमेन्ट बोक्ष में डाल दिया है जो आपके लिये था।

samta gupta kota के द्वारा
July 1, 2010

nice poem razia ji

    razia mirza के द्वारा
    July 1, 2010

    Thanks Samtaji


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