मेरी आवाज सुनो

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........होगा मरहबा मेरे वतन के वास्ते।

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एक नारा आज दो अपने वचन के वास्ते।

कारवाँ अब ये चला है खुद अमन के वास्ते।

क्या लडाइ क्या है हिंसा क्यों ये नफरत है रवाँ?

क्यों है ये जलती ज़मीं, और क्यो है ये जलता जहाँ?

खोल दो पंछी के पर उपर गगन के वास्ते।

कैसा मजहब कैसा इमाँ जिसमें बहता खून है?

कैसे है भटके ये नादाँ, दिल में कैसी धून है?

क्यों ये  छेडी है लडाई एक कफ़न के वास्ते।

है यहीं जन्नत, यहीं दोज़ख, यहीं है जिंदगी।

बाँट के देखो खुशी तो पाओगे तुम भी खुशी।

प्यार बाँटो नौजवानों अंजुमन के वास्ते।

तुम को ये कैसा गुमाँ क्या तुम कोई भगवान हो?

जो हुए गुमराह पथ से तुम तो बस नादान हो।

क्यों चले हो राह तुम अपने पतन के वास्ते।

आयेगा ये दौर फिर से, होगी ज्योतिर्मय ज़मीं।

हर तरफ़ से फ़िर उठेगी प्यार की एक रागिनी।

”राज़” होगा मरहबा मेरे वतन के वास्ते।

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

samta gupta kota के द्वारा
July 5, 2010

रज़िया जी,आपके लेखों में एक तरफ वतनपरस्ती और सामाजिक सरोकार मिलते हैं दूसरी तरफ नाजुक भावनाएं और कोमल अहसास भी,भगवान हमारे देश को लाखो रजिया दे

    razia mirza के द्वारा
    July 5, 2010

    इतनी इज़्ज़त देने के लिये बहोत………शुक्रिया समताजी।

Nikhil के द्वारा
July 3, 2010

आपकी कविता मन मैं एक नया उत्साह भारती है. अच्छा लगा पढ़ कर. आभार, निखिल झा

    razia mirza के द्वारा
    July 4, 2010

    निखिलजी आभार आपकि इस प्रतिक्रिया के लिये।

R K KHURANA के द्वारा
July 3, 2010

प्रिय रज़िया जी, बहुत सुंदर और बहुत ही शिक्षाप्रद कविता है ! इतनी अच्छी कविता के लिए शुभमनाए ! राम कृष्ण खुराना

    razia mirza के द्वारा
    July 3, 2010

    शुक्रिया खुरानाजी आपकी सुंदर कमेन्ट के बदल।

Chaatak के द्वारा
July 3, 2010

बहुत खूब रज़िया जी, आपकी रचना निःसंदेह अपने राष्ट्र पर मर मिटने का जज्बा पैदा करती है l ईश्वर आपकी इस प्रार्थना को स्वीकार करे l आमीन !

    razia mirza के द्वारा
    July 3, 2010

    शुक्रिया चातकजी मेरी रचना को इतनी होंसला अफ़जाई के लिये।


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