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रिश्तों का खज़ाना याद आया.....

Posted On: 4 Jul, 2010 Others,लोकल टिकेट में

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पीछे मुड के हमने जब देख़ा ,गुज़रा वो ज़माना याद आया।

बीती एक कहानी याद आइ, बीता एक फ़साना याद आया।…..पीछे.

सितारों को छूने की चाहत में, हम शम्मे मुहब्बत भूल गये।(2)

जब शम्मा जली एक कोने में, हम को परवाना याद आया।…..पीछे.

शीशे के महल में रहकर हम, तो हँसना-हँसाना भूल गये।(2)

पीपल की ठंडी छाँव तले वो हॅसना-हॅसाना याद आया।…..पीछे.

दौलत ही नहीं ज़ीने के लिये, रिश्ते भी ज़रूरी होते है।(2)

दौलत ना रही जब हाथों में, रिश्तों का खज़ाना याद आया।…..पीछे.

शहरॉ की ज़गमग-ज़गमग में, हम गीत वफ़ा के भूल गये।(2)

सागर की लहरॉ पे हमने, गाया था तराना याद आया।…..पीछे.

चलते ही रहे चलते ही रहे, मंजिल का पता मालूम न था।(2)

वतन की वो भीगी मिट्टी का अपना वो ठिकाना याद आया।…..पीछे.

अपनॉ ने हमें कमज़ोर किया, बाबुल वो हमारे याद आये।(2)

कमज़ोर वो ऑखॉ से उन को वो अपना रुलाना याद आया।…..पीछे.

अय “राज़” कलम तुं रोक यहीं, वरना हम भी रो देंगे।(2)

तेरी ये गज़ल में हमको भी कोइ वक़्त पुराना याद आया।…..पीछे.

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

राजेश, भागलपुर के द्वारा
July 5, 2010

पीछे मुड के हमने जब देख़ा ,गुज़रा वो ज़माना याद आया। बीती एक कहानी याद आई, बीता एक फ़साना याद आया।….. वाह — क्‍या बात है ! कविता की हर एक पंक्ति लाजवाब और वाकई महफ़िल लूटने वाली है।

    razia mirza के द्वारा
    July 5, 2010

    शुक्रिया राजेशजी।

Chaatak के द्वारा
July 4, 2010

“अपनॉ ने हमें कमज़ोर किया, बाबुल वो हमारे याद आये। कमज़ोर वो ऑखॉ से उन को वो अपना रुलाना याद आया।” खूबसूरत नज़्म ! आपने तो महफ़िल ही लूट ली. सुभान-अल्लाह ! सुभान-अल्लाह !

    razia mirza के द्वारा
    July 5, 2010

    शुक्रिया तहे दिल से चातकजी।

R K KHURANA के द्वारा
July 4, 2010

प्रिय रज़िया जी, शीशे के महल में रहकर हम तो हसना हसाना भूल गए ! बहुत सुंदर ! आज की चकाचौंध में लोग बाग पुराने रीती रिवाज़ भी भूल गए है ! बहुत सुंदर लिखा है आपने ! बधाई राम कृष्ण खुराना

    razia mirza के द्वारा
    July 5, 2010

    आभार खुरानाजी।


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