मेरी आवाज सुनो

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....क्योंकि ....आज भारत बंद है....

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आज ओटो नहिं चलेगी

घर में सब्ज़ी नहिं पकेगी

मुन्ना दूध नहिं पीयेगा।

पिता दवा बिन रह जायेंगे…

….क्योंकि ….आज भारत बंद है….

मम्मी काम पे  ना  जायेगी।

फ़िर खाना कैसे लायेगी?

ख़ाली बरतन ख़ाली पेट !!

हम बस भूखे  सो जायेंगे…

….क्योंकि ….आज भारत बंद है….

ठेलेवालों से तो पूछो!!!!

क्या घर ले जायेंगे पूछो!!!

ाली ठेला ले घर जाओ।

बच्चों के मन को बहलाओ!!

….क्योंकि ….आज भारत बंद है….

रस्ते हैं सुनसान लो देखो।

लगते हैं समशान से देखो।

कहीं पे जलते हैं कुछ टायर॥

धुआं उठा आसमान लो देखो।

….क्योंकि ….आज भारत बंद है….

उनके चहेरे आज लो देखो!!!

क्यॉं ऐसे फ़िरते हैं देखो!!!

उन्हें लोगों कि क्या चिंता !!

उन्हें तो अपने वोट की चिंता!!

….क्योंकि ….आज भारत बंद है….





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15 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Amit kr Gupta के द्वारा
October 23, 2010

रजिया जी नमस्कार ,बेशक अच्छी रचना .आपने अपने रचना के माध्यम से भारत बंद के दौरान होने वाले चित्रों का अच्छा चित्रण किया हैं. भारत बंद के बारे में मेरे अपने विचार हैं की यह एक प्रकार का राजनितिक नौटंकी हैं. आम जनता को इससे किसी भी प्रकार का लाभ नहीं होता हैं. इससे आम जनता को नुकसान ही उठाना पड़ता हैं .राजनितिक दल के कार्यकर्ता तांडव मचाते हैं. शांतिपूर्ण बंद को मै सही मानता हूँ बशर्ते वह जनता से सीधे जुड़े मुद्दे पर हो. मेरे ब्लॉग पढने के लिए इस add पर जा सकते हैं. आपके शिकायतों और सुझाव का स्वागत हैं . http://www.amitkrgupta.jagranjunction.com

Manoj के द्वारा
July 6, 2010

बहुत खुब रजिया दीदी, बडी सादगी से आपने बंद का हाल बता दिया.

    raziamirza के द्वारा
    July 6, 2010

    शुक्रिया मनोजजी।

Arvind Pareek के द्वारा
July 6, 2010

आज अनायास ही कुछ समय मिला तो जागरण पर आपके इस ब्लॉग के शीर्षक ने आकर्षित कर लिया पढ़ा तो वाकई मजा आ गया. बहुत अच्छे तरीके से रखी है आपने अपनी बात. बहुत सुंदर.

    raziamirza के द्वारा
    July 6, 2010

    शुक्रिया पारिक साहब आपकी कमेन्ट को पाकर।

राजेश, भागलपुर के द्वारा
July 5, 2010

आपकी बातों से सहमत होते हुए मैं यह कहना चाहूंगा कि अपनी आवाज जन एवं सत्‍ता तक पहुंचाने के और भी कई साधन है। बंद जैसे जन विरोधी साधन से जनहित के साध्‍य भी विलुप्‍त हो जाते है।  बहुत अच्‍छी और सामयिक कविता।

    razia mirza के द्वारा
    July 5, 2010

    आपकी कमेन्ट के लिये इंतेजार ही कर रही थी। शुक्रिया आपका। आपका उत्साह वर्धक कमेन्ट देखकर।

R K KHURANA के द्वारा
July 5, 2010

प्रिय रज़िया जी, बंद की राजनीती चलने वाले क्या जाने की बंद से गरीब और गरीब हो जाता है ! बेहतरीन कविता राम कृष्ण खुराना

    razia mirza के द्वारा
    July 5, 2010

    सही बात है आपकी खुरानाजी। जिन पर बितती है वही जाने कि बंद का क्या असर होता है उनके जनजीवन पर। शुक्रिया खुरानाजी।

मनोज के द्वारा
July 5, 2010

रजिया जी,., आप इस जागरण जंक्शन पर बहुत ही एकटिव है लेकिन सामाजिक विषय पर आपके कमेंट देखने को नही मिलते. आज मैने जागरन जंक्शन पर सोश्ल इश्यू में एक ब्लोग पढा और चाहता हू आप इस विषय पर कमेंट करे ताकि बाकि भी इस समस्या से अवगत हो. कृपया ध्यान अव्शय दें. http://socialissues.jagranjunction.com/2010/07/04/social-issue-and-rape/ जिसने भी लिखा है यह ब्लोग समाज को मद्देनजर रखते हुए लिखा है इसलिए आप इस पर करुर ध्यान अदें साथ ही यह मुद्दा लडकियों से जुडा है.

    razia mirza के द्वारा
    July 5, 2010

    शुक्रिया मनोजजी आपकी कमेन्ट के लिये। आपके दिये हुए लिंक पर मेव्रा जवाब अवश्य होगा। शुक्रिया इस लिंक को मुज़ से अवगत करने पर। मेरा फ़र्ज़ है कि मैं अपनी गलती को मानुं। आपको मेरी ओर से अब फरियाद नहिं होगी। कोशिश करुंगी।

samta gupta kota के द्वारा
July 5, 2010

लेकिन रज़िया जी,आप याद करें इतनी महगाई आपने पहले कभी देखी है,आज तो माध्यम वर्ग भी bpl के आस-पास आ चुका है,सरकार को सांसदों और मंत्रियों के वेतन-भत्ते कम दिखते हैं जिससे कि वो उनकी मांग करते ही तुरंत बढ़ा देती है,जबकि ‘they are good for nothing’,और आम आदमी की उसको परवाह ही नहीं है,आखिर सरकार अपना खर्च कम करके भी तो एक उदहारण पेश कर सकती है,आज सरकार और नेताओं के प्रति आम आदमी के मन मैं विश्वास नहीं है,माँ बताती हैं कि लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर लोग ख़ुशी ख़ुशी एक वक़्त का व्रत रखते थे,लेकिन आज सरकार ने अधिकतर लोगों,गरीबों कि तो बात छोड़ ही दीजिये,इसके लिए मजबूर कर दिया है,क्या लोगों की आय, महंगाई के अनुपात में बढ़ी है?इस बहरी सरकार और निकम्मे नेताओं को आम आदमी कैसे समझाए?बंद किसी भी मसले का इलाज नहीं है,लेकिन आप ही सुझाएँ क्या तरीका हो सकता है जनविरोधी सरकार तक बात पहुँचाने का? नेताओं की ऐश तो करदाता के पैसों से ही हो रही है ना,

    razia mirza के द्वारा
    July 5, 2010

    समताजी । आपने मेरी ज़्यादातर पोस्ट को सराहा है इसलिये आपकी कमेंट मेरे सर आँख़ों पर। मैं आपकी बात से सहमत हुं कि जनविरोधी सरकार तक बात पहुंचाने का क्या तरीका हो सकता है। पर समताजी हमारे देश को करोडों का जो नुकसान हो रहा है उसका क्या? आज की ही बात सिर्फ न्हिं है अब तो हरबार भारत बंद का नारा लगाया जाता है। कोई ये नहिं देखता कि रोज़ कमाकर रोज़ ख़ानेवालों के घर में हररोज़ कि तरहाँ राशन कैसे आयेगा? और अगर बंद है तो कौनसी दुकान से लायेंगे? मेरी रचना सरकार या कोई पार्टि विरोधी नहिं पर एक आम आदमी कि समस्या को सामने रख़ती है। आपकी बात को मैं नकार नहिं सकती। आप भी अपनी राय पर सच ही हैं।

RASHID - Proud to be an INDIAN के द्वारा
July 5, 2010

काश के बंद मानाने वाले इस कविता से कुछ सीख ले

    razia mirza के द्वारा
    July 5, 2010

    सही कहा आपने।


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