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....वो धूप की किरन नहीं..आज की पोस्ट समता गुप्ताजी के नाम

Posted On: 6 Jul, 2010 Others,लोकल टिकेट में

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sun ray

तूं हर सुबह मेरे घर की खिड़की पर दस्तक देती थी।.

छोटी-छोटी किवाडों से मेरे घर में चली आया करती थी।

मैं चिलमन लगा देती फिर भी तू चिलमनो से झांक लिया करती।

तेरी रोशनी चुभती थी मेरी आंखों में,मेरे गालों पर,मेरी पेशानी पर।

मैं तुझे छुपाने कि कोशिश करती थी कभी किताबों के पन्नों से तो

कभी पुरानी चद्दरों से.लेकिन…..

ऎ किरन ! तू किसी न किसी तरहां आ ही जाती.

ना जाने तेरा मुझ से ये कैसा नाता था?क्यों मेरे पीछे पड गई है तूं ?

आज मुझे परदेश जाने का मौका मिला है.मै बहोत खुश हुं।

ऎ किरन ! चल अब तो तेरा पीछा छुटेगा !

दो साल बाद वापस लौटने पर…..

जैसे ही मैने अपने घर का दरवाजा खोला !

मेरा घर मेरा नहीं लगा मुझे,

क्या कमी थी मेरे घर मैं?

क्या गायब था मेरे घर से?…..

अरे हां ! याद आया ! वो किरन नज़र नहीं आती !

बहोत ढुंढा ऊसे,पर कहीं नज़र नहीं आई,वो किरन,

खिड़की से सारी चिलमनें हटा दी मैने,फिर भी वो नहीं आई,

क्या रुठ गई है मुझ से?

घर का दरवाज़ा खोलकर देखा तो,

घर की खिड़की के सामने बहोत बडी ईमारत खडी थी.उसी ने किरन को

रोके रखा था।

आज मैं तरसती हुं, ऊस किरन को, जो मेरे घर में आया करती थी।.

कभी चुभती थी मेरी आंखों में..मेरे गालों पर…

आज मेरा घर अधूरा है, ऊसके बिना.ऊसके ऊजाले से मेर घर रोशन था.

पर आज ! वो रोशनी कहां? क्यों कि ….!

वो धूप की किरन नहीं..

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

vijendrasingh के द्वारा
August 18, 2010

रज़िया जी आपकी लेखनी में एक कशिश है जो बरबस ही आपके लेख पड़ने को मजबूर करते है मन करता है बस पढते रहो………..

Manoj के द्वारा
July 7, 2010

आपकी यह कविता हमारी आदुनिकता पर बेहद तीखा व्यंग्य है जहा आधुनिकता ने हमें अपने पूराने रीति रीवाजों से अलग कर दिया हैं.

    raziamirza के द्वारा
    July 7, 2010

    शुक्रिया मनोजजी। मेरी कविता को सराहने के लिये।


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