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.....ले के आया है कोई ख़जाना।

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rain

आया मौसम बड़ा ही सुहाना।(2)

ले के आया है कोई ख़ज़ाना।…आया मौसम…

आसमॉं पे है बदरी जो छाई,

जैसे काली-सी चादर बिछाई।

डूबा मस्ती में सारा ज़माना।हो…(2)

ले के आया है कोई ख़जाना।…आया मौसम…

आज बादल से बरख़ा गीरि है।

सुख़ी धरती को ठंडक मिली है।

कैसे निकला है धरती से दाना हो..(2)

ले के आया है कोई ख़जाना।…आया मौसम…

आज बरख़ा ने सब को भिगोया।

धूल-मिट्टी को पेड़ों से धोया।

कहे के भूलो हुवा ये पुराना हो..(2)

ले के आया है कोई ख़जाना।…आया मौसम…

सारे पंछी भी गाने लगे है।

सारे प्राणी नहाने लगे है।

मोर-पपीहा हुवा है दीवाना हो…(2)

ले के आया है कोई ख़जाना।…आया मौसम…

नन्हें बच्चों ने कश्ती बनाई।

बहते पानी में उसको चलाइ।

और छेड़ा है कोई तराना हो..(2)

ले के आया है कोई ख़जाना।…आया मौसम…

आओ हम भी ये मस्ती में झुमे।

गिरती बारिश की बुंदों को चुमें।

‘राज़’ तुम भी करो कुछ बहाना हो..(2)

ले के आया है कोई ख़जाना।…आया मौसम…

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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

राजेश, भागलपुर के द्वारा
July 7, 2010

मौसम के अनुरूप बहुत अच्‍छी कविता लिखी हैं आपने। बारिस की बूंदों की तरह आपकी कविता में भी एक संगीत है। कविता की ये पंक्तियां – नन्हें बच्चों ने कश्ती बनाई। बहते पानी में उसको चलाइ। और छेड़ा है कोई तराना । बचपन के दिनों की याद दिलाती है।

    raziamirza के द्वारा
    July 8, 2010

    आभार। राजेशजी। चलो मेरी आपको बचपन में ले जाने की कोशिश कामयाब हुई। और हाँ!!कमेन्ट के लिये  भी आपका आभार\

drsinwer के द्वारा
July 7, 2010

रज़िया जी आपकी कविता बहुत सुन्दर है पढकर मज़ा आया कोशिस करती रहियगा एक दिन कवियत्री जरुर बन सकती हो यह हमारी शुभ कामना है I

    raziamirza के द्वारा
    July 8, 2010

    शुक्रिया डो.साहब। आप की शुभकामनाओं के लिये।

aditi kailash के द्वारा
July 7, 2010

बहुत ही सुन्दर गीत…. वैसे बारिश का अपना ही मजा होता है….. चिलचिलाती गर्मी के बाद बारिश की बूंदें तन और मन दोनों को ही सुकून देती हैं…. बचपन की याद आ जाती है…. और रिमझिम फुहार के साथ चाय और पकौड़ों का अपना ही मजा होता है….

    raziamirza के द्वारा
    July 7, 2010

    शुक्रिया अदीतिजी। आपने तो मुझे पकोडे बनाने पर मजबूर ही कर दीया। आप भी आ जाईये।

    drsinwer के द्वारा
    July 7, 2010

    एक बात और है की खेत मे bignai मे maza hi kuch और है i ajkal mosam bhi barish ka है i

    raziamirza के द्वारा
    July 8, 2010

    ओहो!!! आपने तो रोमेंटीक मुड भी बना डाला। लाजवाब कमेन्ट डो.साहब!

Chaatak के द्वारा
July 7, 2010

रज़िया जी, बहुत ही खूबसूरत नगमा लिखा है आपने हर शब्द में इतना संगीत है जिसका कोई जवाब नहीं| आप चाहें तो खुद गा कर देख ले तर्ज़ है- ‘हम जिए मुस्तकिम कितना नाज़ुक है दिल ये ना जाना, हाय ! हाय ! ये ज़ालिम ज़माना ” मज़ा आ गया ! वाह ! वाह !

    raziamirza के द्वारा
    July 7, 2010

    जी हाँ!!! मैंने आपके कहने पर यही तर्ज़ में गुनगुनाया। मज़ा आया। शुक्रिया मेरे नग़्मे पर इतनी बारिकी से ध्यान देने के लिये। एक अहसास है ये नग़्मा।

manoj के द्वारा
July 7, 2010

आज बादल से बरख़ा गीरि है। सुख़ी धरती को ठंडक मिली है बहुत खु ब लिखा आपने

    raziamirza के द्वारा
    July 7, 2010

    शुक्रिया॥ मनोजजी।

RAASHID के द्वारा
July 7, 2010

रज़िया जी हमेशा की तरह एक अच्छी कविता !!! रज़िया जी मुझे भी कविता लिखना सिखा दीजिये, मैं अपने लेख “मै तुम्हे कभी भूल नही पाऊगा!!” पर कविता लिखना चाहता हूँ !! या आप ही इस पर कोई अच्छी सी कविता लिख दे राशिद

    raziamirza के द्वारा
    July 7, 2010

    बहोत बहोत शुक्रिया। मैं ज़रुर आपके विषय पर कविता भेज दुंगी।

seema के द्वारा
July 7, 2010

नन्हें बच्चों ने कश्ती बनाई। बहते पानी में उसको चलाइ आपने जगजीत सिंह की ग़ज़ल …”ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो ……….वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी ” की याद दिला दी | कसम से हमारा भी मन मचल रहा है कश्ती चलाने को , सुन्दर कविता

    raziamirza के द्वारा
    July 7, 2010

    शुक्रिया सीमाजी। जो महसूस होता है वही लिख्ना चाह्ती हुं मैं और अपने साथ सबको मह्सूस करवाना चाहती हुं। चलो जगजीत सिंह कि वो गजल अब मैं भी गुनगुनाने लगी हुं।


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