मेरी आवाज सुनो

मेरी आवाज़ ही पहचान है॥

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हरदम कदम बढाये रहना।

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हिंमत हारा बैठा था में,

पीठ फिराये भविष्य से।

हार चुका था अपनी शक्ति,

अपनी ही कमजोरी से ।

देखा मैंने एक मकड़ी को,

बार बार  यूँ गिरते हुए।

अपने बुने हुए जाल पे फिर भी,

कंई बार जो सँभलते हुए।

गिरती रही, सँभलती रही पर..

बुनती रही वो अपना जाल।

पुरा बन चुकने पर मकडी,

जैसे हो गई हो निहाल।

एक छोटी मक़्डी ने मुझ में,

भर दी हिंमत कंई अपार।

कुछ करने की ठान ली मैंने,

अब ना रहा मैं यूँ लाचार।

मक़डी ने सिखलाया मुज़को,

हरदम कोशिश करते रहना।

”राज़” कितनी बाधाएं आयें,

हरदम कदम बढाये रहना।

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

राजेश, भागलपुर के द्वारा
July 10, 2010

बहुत अच्‍छी और प्रेरणादायक कविता है। आपकी इस कविता से एक आशा भी है कि नए जगह से जुड़ने के उपरांत जल्‍दी ही तमाम बाधाओं को पार करते हुए आपकी अगली कविता भी पढ़ने को मिलेगी। शुभकामनाओं के साथ – राजेश कुमार सिंह, भागलपुर


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