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......वो माँ की लोरियाँ।

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loriyan

कानों में गुनगुनातीं हैं वो माँ की लोरियाँ।
बचपन में ले के जाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

लग जाये जो कभी किसी अनजान सी नज़र,
नजरें उतार जाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

भटकें जो राह हम कभी अपनों के साथ से,
आके हमें मिलाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

हो ग़मज़दा जो दिल कभी करता है याद जब,
हमको बड़ा हँसाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

अफ़्सुर्दगी कभी हो या तनहाई हो कभी,
अहसास कुछ दिलाती है वो माँ की लोरियाँ।

पलकों पे हाथ फ़ेरके ख़्वाबों में ले गइ|
मीठा-मधुर गाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

दुनिया के ग़म को पी के जो हम आज थक गये|
अमृत हमें पिलाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

माँ ही हमारी राहगीर ज़िंदगी की है,
जीना वही सिखाती है वो माँ की लोरियाँ।

अय “राज़” “माँ “ही एक है दुनिया में ऐसा नाम|
धड़कन में जो समाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

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27 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

kusum sharma के द्वारा
July 29, 2010

मा kee loriya sch kha sare presanee ko hr letee hai.

Raj के द्वारा
July 28, 2010

बचपन की याद ताज़ा हो गई राज़िया जी, कृप्या ऐसे ही लिखा किजिये। राज

भाईजी कहिन Arvind Pareek के द्वारा
July 26, 2010

माँ ही हमारी राहगीर ज़िंदगी की है, जीना वही सिखाती है वो माँ की लोरियाँ। किसी ने कहा है कि भगवान सब जगह नहीं हो सकता इसलिए उसने मां को बनाया है । एक बेहतरीन रचना । अरविन्‍द पारीक

R K KHURANA के द्वारा
July 17, 2010

प्रिय रज़िया जी, आप भी एक मां हैं और एक मां की ममता मां ही बता सकती है ! बहुत सुंदर कविता ! साडी ममता उड़ेल दी आपने ! लग जाये जो कभी किसी अनजान सी नज़र, नजरें उतार जाती हैं वो माँ की लोरियाँ। बहुत सुंदर राम कृष्ण खुराना

sumityadav के द्वारा
July 16, 2010

ममत्वभरी कविता रजियाजी। सचमुच याद आती हैं मां की लोरियां। आपका तो ट्रांसफर हो गया था ना , वैसे अच्छा लगा आपको वापस देखकर। स्वागत है।

    razia mirza के द्वारा
    July 16, 2010

    जी हाँ मेरा ट्रान्सफर हो गया है मैंने नै जगह जोइंट कर भी ली ही पर अभी सन्डे तक की छुट्टी पर आई हूँ इसीलिए मुझे कुछ लिखनेका मौका मिला है| शुक्रिया कमेन्ट के लिए|

राजेश, भागलपुर के द्वारा
July 16, 2010

रजिया जी, थोड़े अंतराल के बाद पुन: आपकी बेहतरीन कविता पढ़ने को मिली। मां को सम‍िर्पित आपकी यह कविता एक हकीकत है और आपकी इस रचना पर सीमा जी द्वारा दिए कमेंट से मैं भी पूरी तरह इत्‍तफाक रखते हुए कहना चाहता हूं कि मां भगवान से भी बढ़कर उसका दूसरा रूप है। दुख होता है ऐसी घटना या ऐसी बातों से जो आसपास में घटित होता है, मां-बाप के प्रति बेटे-बेटियों के रवैये से। खासकर एक खास उम्र के बाद मां-बाप के प्रति बेटे-बेटियों की जो जिम्‍मेदारी है उससे दूर भागने या यू कहें उसके प्रति गैरजिम्‍मेदाराना व्‍यवहार से। आपकी इस कविता ने तो मुझ्‍ो भावनात्‍मक कर दिया। ईश्‍वर करे आपकी कविता में व्‍यक्‍त भाव जन-जन का भाव बने।

    राजेश, भागलपुर के द्वारा
    July 16, 2010

    पिछली प्रतिक्रिया पर आपके जवाब से आशा है आपकी कविता आगे भी शीघ्र पढ़ने को मिलेगी। बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

    razia mirza के द्वारा
    July 16, 2010

    जी हाँ मेरी कोशिश जारी है की मई जल्द ही नेट ले लूँ इसीलिए छुट्टी पर आई हूँ| आपकी कमेन्ट मुझे हर बार इन्सपयेर करती रही है.| शुक्रिया आपकी कमेन्ट का राजेशजी|

kmmishra के द्वारा
July 16, 2010

बचपन याद दिलाने के लिये आपका आभारी हूं । मां को समर्पित बेहद खूबसूरत कविता ।

    razia mirza के द्वारा
    July 16, 2010

    शुक्रिया मिश्राजी आपकी प्रतिक्रया का|

Nikhil के द्वारा
July 16, 2010

माँ शब्द, अद्वितीय, और मेरे ह्रदय के बहुत करीब. आपकी इस कविता ने ह्रदय को द्रवित कर दिया. आपका बहुत बहुत धन्यवाद.

    razia mirza के द्वारा
    July 16, 2010

    धन्यवाद आपका निखील जी | जी हाँ “माँ” अद्वितीय शब्द है हमारे लिए|

seema के द्वारा
July 16, 2010

भाव विभोर कर दिया आपकी कविता नें | चाँद पंक्तियाँ आपके लिए …… स्वयम नहीं आ सकता था भगवान् हमारे दुःख हरने इस लिए तो माँ को बना दिया जग जननी जग की सुख दाता | बच्चों के दर्द से रोता है इतना कोमल माँ का दिल है बच्चों की क्षुधा शांत करके खाती है वही जो बच जाता प्रणाम करूँ तुझको माता बहुत बहुत बधाई टॉप १० ब्लागर्स में आने पर औ इतनी प्यारी कविता के लिए भी | सीमा सचदेव

    razia mirza के द्वारा
    July 16, 2010

    बहोत बहोत बहोत शुक्रिया सीमाजी | आप ने कितनी अच्छी पंक्तियाँ मुझे लिख भेजी है!!!! वाह!!!! और शुक्रिया मुझे टॉप १० kee बढ़ाई देनेके लिए भी| मेरा खुश नसीब है ये|

parveensharma के द्वारा
July 16, 2010

माँ के अद्वितीय गुणों का दर्शन कराती एक खूबसूरत रचना….सरल अलफ़ाज़ में कहा गया मीठा तराना…अज्ञानतावश अफ़्सुर्दगी का अर्थ नहीं समझ पाया….

    razia mirza के द्वारा
    July 16, 2010

    शुक्रिया प्रवीन जी | अफ्सुर्दगी का अर्थ होता है ग़म| जब कभी ग़म में हम होते है तब माँ ही सहारा होती है|

deepaksrivastava के द्वारा
July 15, 2010

माँ की अहमियत को इससे अधिक पुर-दुरुस्त क्या बयान किया जा सकता. एक सुन्दर रचना. बधाई. दीपक श्रीवास्तव

    razia mirza के द्वारा
    July 16, 2010

    शुक्रिया दीपकजी |आप की खुबसूरत कमेन्ट के लिए|

chaatak के द्वारा
July 15, 2010

रज़िया जी, बहुत दिनों के बाद एक ऐसी रचना पढ़ी जिसके हर शब्द में संगीत है, हो सकता है माँ का नाम जुड़ जाने के कारण मुझे ऐसा लगा हो| रचना हर एक लिहाज़ से एक उम्दा नगमे की सभी खासियतें समोए हुए है| बधाई !

    razia mirza के द्वारा
    July 16, 2010

    बहोत बहोत शुक्रिया आपका चातक्जी|

samta gupta kota के द्वारा
July 15, 2010

रज़िया जी,काफी समय के बाद आपको नेट पर पाया,वैसे और सभी रिश्ते-नातों में कमोबेश स्वार्थ होता है सिवाय माँ को छोड़कर,सही लिखा आपने,

    razia mirza के द्वारा
    July 16, 2010

     जी हाँ सच कहा है आपने. मेरी आपसे शिकायत है आपको अर्पण किया मेरा पोस्ट का आप ने जवाब क्यों नहीं दिया? शुक्रिया कमेनट के लीए|

RASHID के द्वारा
July 15, 2010

रज़िया जी आप को दुबारा मंच पे देख कर बहुत ख़ुशी हुई… राशिद

    razia mirza के द्वारा
    July 15, 2010

    अभी तो सिर्फ आज के दिन ही आई हूँ| दुआ करो जल्द वापस आउंगी|

manoj के द्वारा
July 15, 2010

रजिया जी बेहतरीन लिखा है आपने मां की लोरियों की गुंज हमेशा दिल के कोने में रहती ही है. आपने कविता के माध्यम से इसको और सुंदरता से उखेरा है.

    razia mirza के द्वारा
    July 15, 2010

    शुक्रिया मनोज जी| आप सही है|


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