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“क्षितिज” के उस पार या इस पार????भाग-2

Posted On: 10 Sep, 2010 Others,लोकल टिकेट में

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अंदर जाते ही एक छोटा दरवाजा आया। एक लेडी कोंस्टेबल ने खोला।

अपने सर को झुका कर मैं एक बडी-सी ख़ुली जगह में पहोंच गई। वहाँ बडे बडे आम के पेड थे।

एक बडा पीपल का पेड था। जिसके नीचे सफ़ेद साडी पहनें करीबन 20 से 25 औरतें ईकठ्ठा होकर सब्ज़ी काट रही थीं जो थेलों में रख़्खी हुई थी।

उनके सभी के चहेरों पर प्रश्नार्थ था कि मैं कौन हुं? दूर 10 से 12 बच्चे खेल रहेथे।

कईं महिलाएं छोटे से मंदिर के पास मिलकर भजन गा रहीं थीं। बडे बडे लम्बे चार पांच  कमरों  के आसपास कपडे सुखाये हुए थे।

कुछ कदम पर एक मोटी महिलाकोंस्टेबल कुर्सी से उठकर मुझे नमस्ते कहकर बोली

“मेडम आपको  डीस्पेंसरी जाना है?चलो आपको पहोंचादुं। मैं समझ गई कि उसके हाथ के वोकीटोकी पर मेरे आनेका मेसेज आ चुका था। मैं अपनी डीस्पेंसरी पहोंच गई।

“महाराजा गायकवाड “ के ज़माने कि इस बिल्डींग की छत बहोत उंची थी।

और ये डीस्पेंसरी बीच में ही बनी हुई थी। मेरे साथ एक लेडी डोक्टर और दो नर्स भी थी। सभी ने मुझे आवकार दिया। और मैंने अपनी सीट संभालली मन ही मन ये कहते हुए कि मैं जो

“क्षितिज” को देखना चाहती थी कहीं ये वो तो नहिं? या उससे बिल्कुल विपरीत है?

मुझे देख एकएक करके बहोत सी महिलाएं कुछ न कुछ बहाने मेरे पास आने लगीं।

“दीदी आप अब यहाँ रहोगी? रोज़ आया करोगी? देखो मुझे बुखार आ रहा है, मेरा बच्चा बिमार है जैसे कईं सवालों के साथ आने लगीं। मैं सबको पढने की कोशिश करने लगी। पहले ही दिन मैं ये

जानने लगी कि यहाँ मेरा काम ही मुझे नहिं ले आया पर यहाँ मुझे मेरी संवेदनाएं ले आई हैं

ये कहकर कि “ए रज़िया तुमने तुम्हारी ज़िन्दगी में कइं कविताएं/गज़ल/कहानीयाँ लिखीं पर तुम क्या इस दुनिया से वाकिफ़ थी जो यही ज़मीन पर होते हुए दुनिया से दूर है?

हाँ शायद यही “क्षितिज” के इस पार है।

यहाँ हर उम्र की ज़िन्दगी बसी है 1 साल से लेकर 90 साल तक की। अरे कइं ज़िन्दगीयाँ तो पेट में पनप रही हैं जिसकी माँ को अभी अभी ही सज़ा हुई क्योंकि ोई बच्चा अपनी जवान माँ के साथ

ये सज़ा भूगत रहा है तो कोई महिला अपनी बूढी माँ के साथ।

किसी की भाभी जल गई है तो किसी कि बहु। कोई चोरी के इल्ज़ाम में है तो कोई शराब के।

यहाँ छोटी सी 3 साल की “फ़िज़ा” जब मुझे देखती है तो उसकी नादान हँसी भी मुझे चुभती है। क्योंकि उसके पापा इस दरवाज़े कि उस पार के दूसरे बडे दरवाज़े में हैं।

यहाँ कि “फ़िज़ाओं” ने उससेउसका बचपन छीन लिया है कल वो “ईद”भी यहाँ मनायेगी। बडे दरवाज़े के बाहर क्या है उसे पता भी नहिं  क्योंकि उसका जन्म यहाँ आनेके बाद हुआ है।

मंजु माँ 85 साल की हैं इल्जाम है उनकी बहु को जलाया गया था। तब वो 75 की रही होंगी। ज़िन्दगी के 10 साल यहाँ बिता चुकी है। एक बेटा पडोस के दरवाज़े के उस पार है। और भी बेटे हैं पर

वो किसी से मिलना नहिं चाहती क्योंकि साथ में रहनेवाली पूनम बूढी मंजुमाँ का ज़्यादा ख़याल रख़ती है, उनकी वक़्त पर दवा देना। गंदगी साफ़ करना ,ख़ाना लेकर आना वगैरह वगैरह। और फ़िर

कम से कम “पूनम” बहु से तो अच्छी है कि अब कोई इल्ज़ाम नहिं लगाएगी, वो जो हमदर्द-हमसज़ावार है जो।

बडी ऊंची ऊंची दिवारों को फ़ांदते बंदर को “छोटा बाबू” भगाता है

जब बंदर दिवार के ऊस पार चला जाता है तो छोटा सा बाबू अपने तोतले अंदाज में कहता है मैंने बंदल को भगा दिया!!!! यहाँ

ओटो, बस साइकल टेक्षी वगैरह कि आवाज़ तक नहिं आती

पर हाँ यहां ऊपर आसमान में उडते ऎरोप्लेन नज़र आतेहैं। ऎर्पोर्ट यहाँ से कुछ मिल की दूरी पर ही है। बिल्ली के छोटे छोटे तीन बच्चे

यहाँ वहाँ भागते रह्ते हैं।

बिल्ली उन्हें दूर से देखती रहती है। क्योंकि  बिल्ली को यहाँ “कुत्ते” का डर नहिं है।

ऐसी कहीं ज़िन्दगी हैं जो मैं सभी को अपनी ज़बानी कहना चाहुंगी। अभी तो सिर्फ 2% ही बात कह पाई हुं आगे और भी शे’र करती रहुंगी आपके साथ। मैने ये पाया है कि ज़्यादातर महिलाएं

कानुन के तौर तरीकों से अनजान होने के कारन फ़ँस गई हैं। ऐसी महिलाओं कि संख्या  80% है शायद।

पर अभी मैं एक दिन ईद के लिये आई हुं।  फ़िर परसों मुझे पहोंचना  है। ……क्षितिज के इस पार

आप सब से और जागरन ज़ंकशन से मेरा रिश्ता सदा बना रहे इसलिये नेट कनेकशन अपने रिहायशी क्वाटर पर लेने कि मैं अभी कोशिश में लगी हुं। उम्मीद करती हुं

मेरा काम ज़रुर बनजायेगा।

मेरा इंतेज़ार करना जल्द वापस आउंगी । हर ज़िन्दगी का एक एक पहलु लेकर…..


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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

abodhbaalak के द्वारा
September 15, 2010

रज़िया जी, आपके लेख समाज के कडवे सच को लोगों को सामने लाने में बहुत मदद करते हैं, और दिल को छू लेते हैं. आपके अगले ब्लॉग का इंतेज़ार रहेगा

R N Shahi के द्वारा
September 11, 2010

रज़िया जी क्षितिज़ के उस पार की दूसरी कड़ी में आपने बन्दी जीवन की समस्याओं को बहुत व्यापक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया … बधाई । ईद की ढेर सारी बधाइयों के साथ आपकी ब्लाँग पर जल्दी वापसी की भी शुभकामनाएं ।

Ramesh bajpai के द्वारा
September 11, 2010

रजिया जी वहा के अनुभव बाटने का शुक्रिया . आपकी वापसी का इंतजार रहेगा . ईद की शुभ कामनाओ सहित

Piyush Pant के द्वारा
September 10, 2010

शेष का इंतजार है………… एक जिज्ञासा सी उत्पन्न हो रही है अगले लेख के लिए………… तब तक के लिए ईद मुबारक………….

chaatak के द्वारा
September 10, 2010

एक बिलकुल नई दुनिया से परिचय करवाया आपने | एक ऐसी दुनिया जिसके बारे में ज्यादातर लोगों ने सिर्फ सुना है या चलचित्रों में देखा है | निश्चय ही वहां आप जैसे ही किसी पाक-दिल इंसान की ज़रुरत है | आपके अनुभवों और वहां पर जी रही तमाम कहानियों का इंतजार रहेगा| आपको और उन सभी मजबूर लोगों को जो वहां पर सलाखों के पीछे (चाहे किसी गुनाह के कारण या फिर बेगुनाह ही जिन्दगी को सिर्फ जीने के लिए जी रहे हैं) अजब से हालात से जूझ रहे हैं, ईद की शुभकामनाएं | ईश्वर उन्हें गुनाहों से मुक्त कर एक अच्छे जीवन की राह दिखाए| अनुभव बांटने का शुक्रिया!

R K KHURANA के द्वारा
September 10, 2010

प्रिय रज़िया जी, हम आपके लौटने का इंतजार करेंगे ! खुराना


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