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........लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक........

Posted On: 19 Nov, 2010 Others,लोकल टिकेट में

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kaba

 

हज

एक ऐसी अजीमुश्शान इबादत और फ़रीज़ा जिसके हर अमल से इश्क और मोहब्बत और कुरबानी का इज़हार होता है | एक मुसलमान के लिए अपने रब से मोहब्बत का इज़हार करते हुए दुनिया की हर चीज़ को छोडकर सिर्फा और सिर्फ दो बीना सीले हुए कपड़ो में यानी कफ़न पहने सच्चे आशिक बनाकर तमाम तकलीफों और मुसीबतों को खुशी के साथ बर्दाश्त करते हुए अल्लाह की खुशनूदी और रज़ा लेकर उसके दरबार में हाज़िर होता है| उस पाक दरबार में अपने आपको अल्लाह की इबादत में समेट लेता है| हज़ा को आना एक फ़रीज़ा तो है ही | हर मुसलमान इस पाक जगह पर पहोचने के लिए अपनी ज़िन्दगी की कमाई को इकठ्ठा करता है| दुनिया की साड़ी जिम्मेदारियों से फारिग होकर अपने को अल्लाह के सुपुर्द करता है| जो न किसी कर्जदार रहता है| हाजी जब अपने को अहेराम में समेट लेता है उस पर तभी से सारी पाबंदीया शुरू हो जाती हैं|

और हाजी अल्लाह से इन पाबंदीयों को निभाने का वादा करता है|

जैसे की …..

१) अहेराम की हालात में किसी जीव-जंतु को मारना नहीं|

२) शिकार करना नहीं है|

 ३) हरी घास या पेड़ काटने नहीं हैं|

४)खुशबु लगाना नहीं है|

५) नाखुन काटना नहीं है|

 ६) शारीरीक सम्बन्ध बनाना नहीं है|

“लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक, लब्बैक ला शरीका लाका लब्बैक| इन्नल हमदा व नेअमता लाका वाला मुल्क ला शरीक लाका|

( हाज़िर हु अय अल्लाह आपका कोई शरीक नहीं| मैं हाज़िर हु| सारी तारीफें और सब नेअमते आपही के लिए हैं और सारी दुनिया पर हुकुमत आपकी ही है| हुकुमत में आपका कोई शरीक नहीं|

 ”दिया हुआ तो उसी का है मगर हक तो यहाँ है की हक अदा हो जाये”|

 ”तूं नवाबा है तो तेरा करमा है वरना, तेरी ताअतों का बदला मेरी बंदगी नहीं|’

मैं अपने आप को बहोत ही नसीबदार मानती हूँ की अल्लाह ने मुझ पर अपने करम की इनायत अता की|

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rashid के द्वारा
December 2, 2010

हज मुबारक हो रज़िया जी… अल्लाह आप की इबादतों को कुबूल फरमाए !! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

Ramesh Patel के द्वारा
November 28, 2010

रज़िया जी, सबसे पहले तो आपको हज मुबारक, आप ने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में हज के विषय में नियम व उस की महत्‍वता के विषय में लिखा है वह काबिले तारिफ है। धन्‍यवाद Ramesh Patel(Aakashdeep)

    razia mirza के द्वारा
    November 29, 2010

    रमेशजी, आपका मेरे ब्लॉग पर कमेन्ट देने के लिए शुक्रिया

deepak joshi के द्वारा
November 23, 2010

रजि़या जी आदाब, भई आप ने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में हज के विषय में नियम व उस की महत्‍वता के विषय में लिखा है वह काबिले तारिफ है। अच्‍छी रचना के लिए धन्‍यवाद -दीपकजोशी63

    razia mirza के द्वारा
    November 23, 2010

    आपने मेरे इस लेख को सराहा इस लिए बहोत बहोत शुक्रिया दीपकजी |

jalal के द्वारा
November 20, 2010

रज़िया जी आप हज कर चुकी हैं क्या.अभी तो हमारे लोग वही पर हैं. और अगर न किया हो तो अल्लाह से दुआ है की सभी को हासिल हो. औरों से क्या मांगें, मांग लेंगे तुम से खजीना आका हैं प्यारे नबी, बांटते हैं रब का खजीना

    razia mirza के द्वारा
    November 22, 2010

    जी हाँ जलाल साहब !!!मैंने हज किया है मैं भी मिना,अराफात मुज्दाल्फा की उन पहाड़ियों के रस्ते गुज़र चुकी हूँ जहाँ से हमारे प्यारे नबी (स.अ) कभी गुज़रे थे|

abodhbaalak के द्वारा
November 20, 2010

रज़िया जी, सबसे पहले तो आपको हज मुबारक, वास्तव में ये एक अच्छा चलन है जिसमे विश्व के हर देश के रहने वाले, एक ही तरह के वस्त्र में अपनी पूजा अर्चना करते हैं ताकि किस में अमीर गरीब की भावना ना रहे. वास्तव में हर तरह की पूजा का स्तम्भ आपकी नियत पर है, अगर आडम्बर के साथ की जाए तो उसका कोई लाभ नहीं. , http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    smma59 के द्वारा
    November 23, 2010

    रज़िया जी आप को हज्ज मुबारक. मुझे दुआ मैं याद ज़रूर रखें. आप ताकेनन खुशकिस्मत हैं जो अल्लाह से आपको यह मौक़ा दिया.

    abodhbaalak के द्वारा
    November 24, 2010

    mere se koi narazgi hai, no reply?

    razia mirza के द्वारा
    November 24, 2010

    अरे नहीं अबोध्जी मैंने आपकी कमेन्ट को देखा ही नहीं था मुआफ करना |आपने सच कहा है की “वास्तव में हर तरह की पूजा का स्तम्भ आपकी नियत पर है, अगर आडम्बर के साथ की जाए तो उसका कोई लाभ नहीं.


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