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....थोड़ी सी बेवफाई!!!!!

Posted On: 29 Nov, 2010 Others,लोकल टिकेट में

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a criying eye

 

अपने मतलब के लिए या कुछ थोड़ी बहोत खुशी याने अपने कुछ स्वार्थ के लिए आदमी इतना तो मतलबी और स्वार्थी हो जाता है तब वो ये भूल जाता है की किसी की उम्मीद उस पर निगाहें लगाए बैठी है| जो उसकी वफादारी,विश्वास नहीं खरीद सकते |

 इंसान अपनी बेवफाई को शायद अपनों से छुपा सकता है| वो एक बार तो उपरवाले की भी देखी -अनदेखी कर सकता है पर अपने आपको कभी माफ़ नहीं कर सकता |चाहे वो हमारे ईमान से हो या वतन से ,चाहे अपनों से हो या परायों से | वफादारी नाम ही ऐसा है जो हमारे लहू के साथ साथ हमारे जमीर से भी जुडा होता है|

हमें कोइ हक नहीं है की हम किसी से बेवफाई कi खेल खेलें या किसी की भावनाओं को छेड़ें|

क्यों की हमारी थोड़ी सी बेवफाई हमें जिन्दगी भर का दाग़ दे जाती हैं|

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
January 3, 2011

नव वर्ष 2011 आपके व आपके परिवार के साथ सभी के लिए सुखदायक, मंगलकारी व आन्नकददायक हो। आपकी सारी इच्छारएं पूर्ण हो व सपनों को साकार करें। आप जिस भी क्षेत्र में कदम बढ़ाएं, सफलता आपके कदम चूमें। Wish you a very Happy New Year 2011. May the New Year turn all your dreams into reality and all your efforts into great achievements. अरविन्दr पारीक ARVIND PAREEK http://bhaijikahin.jagranjunction.com

Rashid के द्वारा
December 2, 2010

सच रज़िया जी ,, हमे किसी की भावनाओं से खेलने का कोई हक नहीं है !! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

Harish Bhatt के द्वारा
November 30, 2010

बहुत ही कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया आपने. हार्दिक बधाई.

    razia mirza के द्वारा
    December 1, 2010

    शुक्रिया भट्ट साहब |

allrounder के द्वारा
November 30, 2010

रजिया जी, प्रणाम आपने सच कहा की किसी की थोड़ी से बेवफाई जिन्दगी भर का दाग दे सकती है, किन्तु हम आपका स्वागत और आभार व्यक्त करते हैं जो जागरण मंच पर दोबारा आकर आपने इस मंच से बेवफाई नहीं की !

    razia mirza के द्वारा
    December 1, 2010

    शुक्रिया मैं अभी सौदी अरेबिया हूँ पर जागरण से नाता तो जुड़ा ही रहेगा

syeds के द्वारा
November 30, 2010

रज़िया जी संक्षिप्त मगर असरदार लेख…आदमी इतना तो मतलबी और स्वार्थी हो जाता है तब वो ये भूल जाता है की किसी की उम्मीद उस पर निगाहें लगाए बैठी है| किसी शायर ने कहा है. हम बावफा थे इस लिए नज़रों से गिर गए, शायद उन्हें तलाश किसी बेवफा कि थी.

nishamittal के द्वारा
November 30, 2010

बेबफाई चाहे वो व्यक्ति विशेष के प्रति हो,देश समाज के प्रति या फिर परिवार के (करने वाले को)अपनी ही दृष्टि में हीनता का बोध कराती है.क्या बात है रज़िया जी बहुत दिन बाद?

abodhbaalak के द्वारा
November 30, 2010

रज़िया जी बहुत थोड़े में आपने बहुत ही गहरी और सच्ची बात कही है, लेकिन शायद आजका इंसान बेहिस हो गया है, उसके अन्दर का इंसान शायद मुर्दा हो गया है, जान बूझ कर गुनाह करना उसे अब बुरा नहीं लगता पहले ही कहा की थोड़े में ही गहरी और सच्ची बात. http://abodhbaalak.jagranjunction.com


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