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.....एक दिन के सुलतान....देखना कहीं हमारे पंखों को काट मत देना

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पतंग

आज एक दिन के लिये ये आसमाँ पर तुम अपना हक़ जताने चले हो अपने रंग-बिरगी पंखों से सभी को ललचाने लगते हो?

… पर ये मत भूलो तुम्हें एक डोर पकडे हुए है।

तुम डोर के सहारे आसमाँ की उंचाई नापने कि कोशिश करते हो?

तुम तो एक कठपूतली के समान हो जैसे किसी हाथ से डोर तूटी तुम भी कट जाते हो।

….और फ़िर किसी ओर के हाथों में चले जाते हो।

तुम में जान थोडी है? जो ईतना इतराते हो आसमाँ पर …!!!

एक दिन के सुलतान बने बैठे हो ।तुम हो क्या ?

तुम तो एक कागज़ के बने निर्जीव हो!!!

तुम ये मत भूलो कि हम  तो एक ज़िन्दा जीव हैं।

सुबह होते ही अपने घोसलों से कहीं  दूर..दूर अपने लिये तो कभी अपने बच्चों के लिये दाना चुगने जाते हैं।

शाम होते ही अपने घर लौट आते हैं फ़िर यही अपने पंखों पर..

उडना ही हमारा क्रम है।

देखना कहीं हमारे पंखों को काट मत देना वरना हम आस्माँ को फ़िर कभी छू नहिं पायेंगे।

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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Alka Gupta के द्वारा
January 15, 2011

राज़िया जी , एक पतंग को माध्यम बनाकर बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ लिखीं हैं ……!

    razia mirza के द्वारा
    January 15, 2011

    आभार अल्काजी आपकी कमेन्ट के लिए|

Arunesh Mishra के द्वारा
January 15, 2011

शायद इसको ही एक कलाकार की कल्पना कहते है जो एक निर्जीव के माद्यम से इतनी सरल और मधुर पंक्तियाँ जोड़ पाए.

    razia mirza के द्वारा
    January 15, 2011

    अरुनेश्जी आपकी होस्लाफ्जाई के लिए आपका शुक्रिया| आपने मुझे एक बहोत ही अच्छे शब्द से नवाजा है|

January 15, 2011

रजिया जी परिंदों को पसंद करने वाली रोशनी जी को आपकी रचना अवश्य पसंद आएगी. परिंदों की आवाज बनने के लिए शुक्रिया.

    razia mirza के द्वारा
    January 15, 2011

    राजेन्द्रजी आभार आपकी कमेन्ट के बदल और हाँ मेरी रचना को सराहने के लिए भी!!!

allrounder के द्वारा
January 15, 2011

रजिया जी, नमस्कार और एक अच्छे लेख के लिए बधाई ! आपको वापस यहाँ पाकर ख़ुशी हुई !

    razia mirza के द्वारा
    January 15, 2011

    शुक्रिया allrounderji आपकी प्रतिक्रिया के लिए|

Deepak Sahu के द्वारा
January 15, 2011

Mahodaya ji! Atyant sundar rachana apki. Badhayi! DEEPAK

    razia mirza के द्वारा
    January 15, 2011

    आभार आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए दीपकजी

Harish Bhatt के द्वारा
January 15, 2011

रज़िया जी नमस्ते, बहुत ही बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई.

    razia mirza के द्वारा
    January 15, 2011

    शुक्रिया हरीशजी |

Rashid के द्वारा
January 15, 2011

खुशामदीद रज़िया जी !! अबोध भाई ने सही लिखा है ,, आप के बिना मंच पर कुछ कमी महसूस होती थी !! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    razia mirza के द्वारा
    January 15, 2011

    शुक्रिया रशीद साहब आपके भावना की क़द्र करती हूँ.और हाँ कमेन्ट के लिए शुक्रिया अदा करती हूँ |

abodhbaalak के द्वारा
January 15, 2011

रजिया जी मंच पर आपका फिर से स्वागत है, आपके बिना मंच पर एक कमी सी थी… आपने पतंग को ….. बना मानव के ऊपर जो ……… अति सुन्दर…. आशा है की अब आपकी अगली पोस्ट के लिए इतनी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    razia mirza के द्वारा
    January 15, 2011

    अबोधजी आपकी कमेन्ट और भाव की क़द्र करते हुए आपका शुक्रिया अदा कराती हूँ.जी हाँ मैं फिर जागरण पर रेग्युलर आउंगी क्यों की अभी तो कैफे जाना पड़ता है अब जल्द ब्रॉडबैंड आ जायेगा.फिर आपको मेरी और से कोई शिकायत नहीं रहेगी.

nishamittal के द्वारा
January 15, 2011

रज़िया जी अच्छी प्रस्तुति ,आप बीच बीच में गायब हो जाती हैं मंच से.

    razia mirza के द्वारा
    January 15, 2011

    क्या करें जॉब ही ऐसी है पर सच कहें जागरण बिना अधुरा-सा लगता है|शुक्रिया कमेन्ट के लिए|

Ramesh bajpai के द्वारा
January 15, 2011

सुबह होते ही अपने घोसलों से कहीं दूर..दूर अपने लिये तो कभी अपने बच्चों के लिये दाना चुगने जाते हैं। शाम होते ही अपने घर लौट आते हैं फ़िर यही अपने पंखों पर.. रजिया जी वाह…. किस खूब सूरत अंदाज में आपने हकीकत को बंया किया है ,बधाई

    razia mirza के द्वारा
    January 15, 2011

    आभार बाजपेयीजी आपने जो गहराई से मेरी रचना को पढ़ा और सराहा|

drsinwer के द्वारा
January 14, 2011

बहुत ही अच्छा कहा अपने मुबारकवाद

    razia mirza के द्वारा
    January 14, 2011

    शुक्रिया drsinwer साहब

sdvajpayee के द्वारा
January 14, 2011

क्‍या सुंदर- श्रेष्‍ठ विचार दर्शन है !

    razia mirza के द्वारा
    January 14, 2011

    आभार वाजपेयीजी


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