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....हम भी किसी से कम नहिं!!!!!

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eggs pigeonkids!!!

अब हम क्या करें?  :roll:

आप ही बताइये।

आप इन्सानों ने हमारे आशियाने हम से छीन लिये ।

पेड काटकर सिमेन्ट और कोंक्रेट के जंगल खडे कर दिये। तो बताइये हम कहां जायें?

फ़िर आप लोग अपनी बाल्कनीयों में पेड बोने चले हो?

हम भी कम नहिं!!!!

लो !!! आप के फ़ुल के गमले में ही हम ने अपना घोंसला बना लिया और देख रहे हो आप?

एक नया जन्म भी ले लिया है हमारे बच्चों ने!!!!!

हम थोडे न रुकनेवाले हैं?

हम भी किसी से कम नहिं!!!!! :lol:

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28 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ARUN के द्वारा
April 2, 2011

WONDERFU THING, WRITTEN BY SWEET PERSON.

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 6, 2011

आदरणीय रज़िया जी …..सादर अभिवादन ! जिन्दगी को विपरीत हालात में भी जीना ही असली जीवन कहा जाएगा ….. फिर चाहे वोह मुंबई में पाइपों में प्राणियों द्वारा अपनी सारी जिन्दगी बिताना हो या फिर इन पक्षियों द्वारा अपने रहने की मूल जगहों का खत्म होने के बाद किसी दूसरी जगह को ही अपना आशियाना बनाना हो ….. बहुत ही बढ़िया लेख सुन्दर चित्रों से सुज्जित

    razia mirza के द्वारा
    March 14, 2011

    rajkamalji सही कहते है^ जिन्दगी को विपरीत हालात में भी जीना ही असली जीवन कहा जाएगा …..आपकी कमेन्ट के लिए आपका बहोत शुक्रिया|

Harish Bhatt के द्वारा
March 3, 2011

आदरणीय रजिया जी सादर प्रणाम, बहुत बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई.

    razia mirza के द्वारा
    March 3, 2011

    शुक्रिया हरीशजी आपकी कमेन्ट के लिए|

nikhil jha के द्वारा
March 3, 2011

बेजुबान के दर्द को शब्दों में ढालना बहुत ही कठिन है और आपने इस कठिन काम को बड़ी सरलता से किया है. बधाई निखिल झा

    razia mirza के द्वारा
    March 3, 2011

    आभार निखिलजी आपकी उत्साहवर्धक कमेन्ट के लिए|

aftab azmat के द्वारा
March 3, 2011

रज़िया वास्तव में आपने इन फोटो से एक बहुत बड़ी हकीक़त और इन बेजुबानो का दर्द बाया किया है…बहुत सुंदर..

    razia mirza के द्वारा
    March 3, 2011

    शुक्रिया आपका आफ़ताब साहब!!

charchit chittransh के द्वारा
March 3, 2011

शानदार ! रजिया जी , इन पंक्तिओं से कम नहीं आपके विचार ….. कहते है परिंदों में फिरकापरस्ती नहीं होती कभी मंदिर पे जा बैठे कभी मस्जिद पे जा बैठे !

    razia mirza के द्वारा
    March 3, 2011

    कहते है परिंदों में फिरकापरस्ती नहीं होती कभी मंदिर पे जा बैठे कभी मस्जिद पे जा बैठे ! ये पंक्ति लिखकर आपने मेरे विचारों की सराहना की है इस लिए आपका बहोत बहोत शुक्रिया|

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
March 3, 2011

विचारणीय विषय को, पक्षियों की प्रतीकात्मकता से शब्द देती सुन्दर अभिव्यक्ति | बधाई

    razia mirza के द्वारा
    March 3, 2011

    शुक्रिया शैलेशजी |आपकी कमेन्ट का|

shab के द्वारा
March 2, 2011

बहुत खूब रज़िया जी …..किया बात है आपकी …सबसे अलग रचना है आपकी जवाब नहीं आप के लेख का…..बधाई हो….

    razia mirza के द्वारा
    March 2, 2011

    शबनमजी बहोत बहोत शुक्रिया आपका|

shuklabhramar5 के द्वारा
March 2, 2011

रजिया जी मान लिया हमने आप भी किसी से कम नहीं ..बहुत खूब चित्रों के साथ प्रस्तुति और आपका सन्देश बहुत भाया.. साथ में स्मायिलिज भी ..मुबारक हो .. शुक्लाभ्रमर५

    razia mirza के द्वारा
    March 2, 2011

    एक दम झक्कास कमेन्ट के लिए आपका बहोत बहोत शुक्रिया शुक्लाजी |

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 2, 2011

रज़िया जी, बहुत ख़ूब|आपकी पोस्ट बहुत पसंद आई|

    razia mirza के द्वारा
    March 2, 2011

    शुक्रिया आपका वाहिद जी|

nikhil के द्वारा
March 2, 2011

अर्थपूर्ण प्रस्तुतीकरण.. …बहुत बढ़िया लगी ये पोस्ट

    razia mirza के द्वारा
    March 2, 2011

    शुक्रिया निखिलजी आपकी सराहनीय कमेन्ट का|

rajeev dubey के द्वारा
March 2, 2011

रजिया जी, चित्रों की बरसात है…मानों होली पर गीले रंग की फुहार हो… ऊपर से स्माइलीस भी… बधाई हो कोमल भावों की अभिव्यक्ति पर. आपने अपना चित्र भी बदल दिया है. नवीनता का स्वागत है.

    razia mirza के द्वारा
    March 2, 2011

    बहोत ही सराहनीय कमेन्ट देकर आपने होली का भी मानों स्वागत कर दिया है| आपको भी आनेवाली होली का त्यौहार मुबारक हो|आभार आपकी कमेन्ट का राजीवजी |

javed ahmed के द्वारा
March 2, 2011

bahut khoob razia ji… parindo ke dard ko samjha aur byan kiya aap ne…

    razia mirza के द्वारा
    March 2, 2011

    जावेद साहब! बहोत बहोत शुक्रिया! ये मेरे ही घर की खिड़की की तस्वीर है|

chaatak के द्वारा
March 2, 2011

रज़िया जी, आपने तो सचमुच ही इन पक्षियों को आवाज़ दे दी| कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि आप कुछ कह रही हों हर शब्द मानो ये तस्वीरें ही बोल रही हैं| इतनी अच्छी अभिव्यक्ति पर बहुत बहुत बधाईयाँ!

    razia mirza के द्वारा
    March 2, 2011

    जी हाँ चातक जी ये मेरे घर की खिड़की से मैंने ली हुई तस्वीर है| बहोत दिनों से निगाह थी इन पर | आज मिझे एक रचना के रूप में मिल गयी | शुक्रिया आपकी कमेन्ट का| वेलेंटाइन किंग!!!!


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